Feed aggregator

आधुनिकता की भेंट चढ़े किसानों के मित्र पक्षी

Kisan help - 16 May 2018 - 3:51pm

किसानों के मित्र समझे जाने वाले मित्र पक्षियों की कई प्रजातियां काफी समय से दिखाई नहीं दे रहीं हैं। किसान मित्र पक्षियों का धीरे-धीरे गायब होने के पीछे बहुत से कारणों में एक बड़ी वजह किसानों द्वारा कृषि में परंपरागत तकनीक छोड़ देने, मशीनीकरण व कीटनाशकों के व्यापक इस्तेमाल को माना जा रहा है।
गाँव-गाँव में मोबाइल फोन के टावरों से निकलने वाली तरंगों से भी मित्र पक्षियों तथा कीटों पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है। कौन से हैं किसानों के मित्र किसान मित्र पक्षियों में मोर, तीतर, बटेर, कौआ, शिकरा, बाज, काली चिड़ी और गिद्ध आदि हैं, जो दिन-प्रतिदिन लुप्त होते जा रहे हैं। ये पक्षी खेतों में बड़ी संख्या में कीटों को मारकर खाते हैं। आज से एक दशक पहले तक ये पक्षी काफी अधिक संख्या में थे लेकिन अब इनमें कुछ पक्षियों के दर्शन ही दुर्लभ हो गए हैं।
सबसे ज्यादा असर तो खेतऔर घरों में आमतौर पर दिखने वाली गौरया चिड़ी पर पड़ा है। खेतों में तीतर व बटेर जैसे पक्षी दीमक को खत्म करने में सहायक थे, क्योंकि उनका मनपंसद खाना दीमक ही है। इनके प्रजनन का माह अप्रैल, मई है और ये पक्षी आम तौर पर गेहूं के खेत में अंडे देते है। आज किसान गेहूँ कम्बाइन से काटते हैं और बचे हुए भाग को आग लगा देते हंै। इससे तीतर, बटेर के अंडे, बच्चें आग की भेंट चढ़ जाते है। इसी कारण इनकी संख्या में कमी आ रही है।
नरमा, कपास के खेतों में दिन-प्रतिदिन कीटनाशकों का जरूरत से ज्यादा छिड़काव हो रहा है। जिससे बड़ी संख्या में तीतर-बटेरों की हर साल मौत हो जाती है। कमोबेस यही स्थिति मांसाहारी पक्षियों बाज, शिकरा, गिद्ध और कौवों की भी है।

खूबसूरत मोर भी हुए लुप्तप्राय गाँव का सबसे खूबसूरत पक्षी और वर्षा की पूर्व सूचना देने वाले मोर भी अब लुप्त होते जा रहे है। ये पक्षी किसानों को सांप जैसे खतरनाक जंतुओं से भयमुक्त रखता है और साथ ही पक्षी शिकार कर खेतों से चूहे मारकर खाने में मशहूर है। वर्तमान में जहरीली दवाओं की वजह से मोरों की संख्या बहुत कम हो गई है।

मुर्दाखोर गिद्ध भी गायब हैं भारत मे कभी गिद्धों की नौ प्रजातियां पाई जाती थी, लेकिन अब बिरले ही कहीं दिखाई देते हैं। संरक्षण कार्यकर्ताओं का मानना है कि पिछले 12 सालों में गिद्धों की संख्या में अविश्वसनीय रूप से 97 प्रतिशत की कमी आई है। गिद्धों की इस कमी का एक कारण बताया जा रहा है: पशुओं को दर्दनाशक के रूप में दी जा रही दवा डायक्लोफ़ेनाक, और दूसरा, दूध निकालने लिए के लगातार दिए जा रहे ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन। उपचार के बाद पशुओं के शरीर में इन दवाओं के रसायन घुल जाते हैं और जब ये पशु मरते हैं तो ये रसायन उनका मांस खाने वाले गिद्धों की किडनी और लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं। मुर्दाखोर होने की वजह से गिद्ध पर्यावरण को साफ-सुथरा रखते है और सड़े हुए माँस से होने वाली अनेक बीमारियों की रोकथाम में सहायता कर प्राकृतिक संतुलन बिठाते है।

गिद्धों की जनसंख्या को बढ़ाने के सरकारी प्रयासों को मिली नाकामी से भी इनकी संख्या में तेजी से गिरावट आई है। इनकी प्रजनन क्षमता भी संवर्धन के प्रयासों में एक बड़ी बाधा है, एक गिद्ध जोड़ा साल में औसतन एक ही बच्चे को जन्म देता है। कीटनाशकों के प्रयोग से मरे अधिकांश पक्षी कीटनाशकों का प्रयोग लगातार बढऩे से अन्य कीटों के साथ-साथ चूहे भी मर जाते हैं और इन मरे हुए चूहों को खाने से ये पक्षी भी मर जाते हैं। इसी प्रकार कौवे तथा गिद्ध भी जहर युक्त मरे जानवरों को खाने से मर रहे हैं। खेतों में सुंडी जैसे कीटों को मारकर खाने वाली काली चिडिया व अन्य किस्म की चिडियों पर भी कीटनाशकों का कहर बरपा है। अब ये पक्षी कभी-कभार ही दिखाई देते हैं।

वृक्षों का कटना भी है कारण खेतों से पक्षियों के गायब होने का एक बड़ा कारण है किसानों द्वारा वृक्षों का काटना। किसानों द्वारा किसी जमाने में खेतों में वृक्षों के नीचे पक्षियों के लिए पानी व खाने का प्रबंध किया जाता था, परंतु अब ठीक इसके विपरीत हो रहा है, जिससे अब पक्षियों का रूख खेतों की तरफ नहीं हो रहा है।

मृदा संरक्षण

Kisan help - 10 May 2018 - 9:50am
मृदा संरक्षण (Soil Conservation)

मिट्टी एक अमूल्य प्राकृतिक संसाधन है, जिस पर संपूर्ण प्राणि जगत निर्भर है । भारत जैसे कृषि प्रधान देश में; जहाँ मृदा अपरदन की गंभीर समस्या है, मृदा संरक्षण एक अनिवार्य एवं अत्याज्य कार्य है। मृदा संरक्षण एक प्रक्रिया है, जिसके अन्तर्गत न केवल मृदा की गुणवत्ता को बनाये रखने का प्रयास किया जाता है, बल्कि उसमें सुधार की भी कोशिश की जाती है । मृदा संरक्षण की दो विधियाँ हैं -

क) जैवीय विधि ब) यांत्रिक विधि ।

(क) फसल संबंधी -

1. फसल चक्रल - अपरदन को कम करने वाली फसलों का अन्य के साथ चक्रीकरण कर अपरदन को रोका जा सकता है । इससे मृदा की उर्वरता भी बढ़ती है ।
2. पट्टीदार खेती - यह जल-प्रवाह के वेग को कम कर अपरदन को रोकती है ।
3. सीढ़ीनुमा खेती - इससे ढ़ाल में कमी लाकर अपरदन को रोका जाता है । इससे पर्वतीय भूमि को खेती के उपयोग में लाया जाता है ।
4. मल्विंग पद्धति - खेती में फसल अवशेष की 10-15 से.मी. पतली परत बिछाकर अपरदन तथा वाष्पीकरण को रोका जा सकता है । इस पद्धति से रबी की फसल में 30 प्रतिशत तक की वृद्धि की जा सकती है।
5. रक्षक मेखला - खेतों के किनारे पवन की दिशा में समकोण पर पंक्तियों में वृक्ष तथा झाड़ी लगाकर पवन द्वारा होने वाले अपरदन को रोका जा सकता है ।
6. खादों का प्रयोग - गोबर की खाद, सनई अथवा ढँचा की हरी खाद एवं अन्य जीवांश खादों के प्रयोग से भू-क्षरण में कमी आती है ।

(ख) वन रोपण संबंधी पद्धति -

वन मृदा अपरदन को रोकने में काफी सहायक होते हैं । इसके तहत दो कार्य आते हैं -
प्रथम, नवीन क्षेत्रों में वनों का विकास करना, जिससे मिट्टी की उर्वरता एवं गठन बढ़ती है। इससे वर्षा जल एवं वायु से होने वाले अपरदन में कमी आती है ।
द्वितीय, जहाँ वनों का अत्यधिक विदोहन, अत्यधिक पशुचारण एवं सतह ढलवा हो, वहाँ नये वन लगाना ।

(ग) यांत्रिकी पद्धति

यह पद्धति अपेक्षाकृत महंगी है पर प्रभावकारी भी ।
1/ कंटूर जोत पद्धति - इसमें ढ़ाल वाली दिशा के समकोण दिशा में खेतों को जोता जाता है, ताकि ढ़ालों से बहने वाला जल मृदा को न काट सके ।
2/ वेदिका का निर्माण कर अत्यधिक ढ़ाल वाले स्थान पर अपरदन को रोकना ।
3/ अवनालिका नियंत्रण - (क) अपवाह जल रोककर (ख) वनस्पति आवरण में वृद्धि कर तथा (ग) अपवाह के लिए नये रास्ते बनाकर ।
4/ ढ़ालों पर अवरोध खड़ा कर ।
मृदा संरक्षण हेतु सरकारी प्रयास
भारत में प्रथम पंचवर्षीय योजना के प्रारंभ के साथ ही इस दिशा में अनेक कदम उठाए जाने लगे थे । सुदूर संवेदन तकनीकी की मदद से समस्याग्रस्त क्षेत्र की पहचान की जा रही है । 
विभिन्न क्षेत्रों में वानिकीकरण की राष्ट्रव्यापी शुरूआत की गई है । इसमें सामाजिक वानिकी भी शामिल है ।
राजस्थान में इंदिरा गाँधी नहर परियोजना, मरू विकास कार्यक्रम तथा मरूथल वृक्षारोपण अनुसंधान केन्द्र आदि की शुरूआत की गई है।
शत-प्रतिशत केन्द्रीय सहायता से झूम खेती नियंत्रण कार्यक्रम पूर्वोत्तर राज्यों, आन्ध्र प्रदेश तथा उड़ीसा में शुरू किया गया है । इसके अलावा भी मृदा संरक्षण हेतु प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से कई कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं।

मृदा प्रदूषण (Soil Pollution)

मिट्टी की भौतिक तथा रासायनिक विशेषताओं में अपने ही स्थान पर परिवर्तन या हृस होना ही मृदा-प्रदूषण है । इसमें मिट्टी में गुणात्त्मक हृस होता है, जिसे मृदा अवनयन Soil Degradation कहा जाता है। इसके निम्न रूप हैं-

1 ऊसरीकरण

सामान्य शब्दों में जिस मिट्टी में नमक के कणों की परत मिट्टी की ऊपरी सतह पर मिलती है उसे ऊसर कहा जाता है । ऊसर भूमि में क्षारीयता (Alkolimity)  अधिक होती है । भारत में ऊसरीकरण मुख्य रूप से दो कारणों से हो रहा है:-
अ. प्रथम कारण प्राकृतिक है, जिसमें भूमिगत जल स्तर ऊँचा होता है । उच्च भूमिगत जल स्तर वाले भागों में अधिक ताप के कारण वाष्पीकरण होता है, जिसके फलस्वरूप नमक के कण केशिका क्रिया Capillary Action)  द्वारा ऊपर आकर जमा हो जाते हैं । इस प्रकार के ऊसर के टुकड़े समूचे उत्तरी मैदान के पट्टियों में मिलते हैं । दूसरा क्षेत्र गुजरात है, जहाँ अधिक तापमान के कारण वाष्पीकरण अधिक होता है । इससे नमक ऊपरी सतह पर आ जाता है । तीसरा क्षेत्र तटवर्ती राज्यों का है, जहाँ समुद्र का नमकीन जल भूमिगत जलभरों ;ळतवनदक ।Ground Aquifers)में प्रविष्ट हो जाता है । इसका नमक पुनः केशिक क्रिया द्वारा धरातल पर जमा हो जाता है ।
ब. लवणीकरण का दूसरा कारण मानवीय अर्थात् नहरों द्वारा सिंचाई है । नहरों के जल के रिसाव से या नहरों के कटने से, भूमिगत जल स्तर ऊँचा हो जाता है, जिससे केशिका क्रिया द्वारा नमक के कण धरातल पर जमा हो जाते हैं । भारत में नहरों द्वारा सिंचित सभी क्षेत्रों में मिट्टी में लवणीकरण की मात्रा में वृद्धि हुई है ।

नियंत्रण के उपाय -

सन् 1876 में उत्तरी-पश्चिमी प्रान्त की सरकार ने रेह आयोग ;(Reh Commission)  की स्थापना की थी जिसने ऊसरीकरण का कारण बड़ी नहरों के निर्माण को बताया था । 1972 में यह विषय सिंचाई आयोग द्वारा पुनः उठाया गया, जिसने दो कदम सुझाये थे -
अ. उचित जल-प्रवाह व्यवस्था तथा
ब. नहरों द्वारा जल रिसाव पर नियंत्रण ।
सन् 1976 में राष्ट्रीय कृषि आयोग के अनुमान से भारत में जलप्लावित तथा लवणीकृत क्षेत्र 1.3 करोड़ हेक्टेयर था । सन् 1988 में योजना आयोग द्वारा एक कार्यदल नियुक्त किया गया, जिसका उद्देश्य आठवीं योजनावधि में ऐसी भूमि के बारे में प्रस्ताव तैयार करना था । इस कार्यदल ने प्रस्तुत किया कि भारत में जलप्लावन तथा लवणीकरण से प्रभावित क्षेत्र प्रतिवर्ष 9 लाख हेक्टेयर की दर से बढ़ रहा है । 1991 में कुल प्रभावित क्षेत्र 20.3 लाख हेक्टेयर था ।

2- बंजर भूमि

जिस भूमि का कोई आर्थिक प्रयोग न हो, उसे बंजर भूमि कहा जाता है । इसके निम्न कारण होते हैं -
1. दोषपूर्ण भूमि एवं जल प्रबंधन ।
2. निर्वनीकरण ।
3. अति पशुचारण, तथा
4. अति कृषि ।

3- नम भूमि

नम भूमि स्थलीय तथा जलीय परिस्थितिक तंत्र के मध्य वह संक्रमणीय पेटी होती है जहाँ या तो भूमिगत जलस्तर अत्यधिक ऊँचा या सतह के पास होता है या भूमि पूर्णकालिक या अल्पकालिक रूप से जलमग्न होती है । उदाहरण के लिए भारत का पश्चिमी एवं पूर्वी तटवर्ती भाग; जहाँ लैगून, झील, डेल्टा तथा तट रेखा के सहारे नम-भूमि क्षेत्र है । इसके अतिरिक्त देश के आतंरिक भागों में झीलों के पास का भाग तथा बाढ़ के दौरान जलप्लावित भाग नम-भूमि के अन्तर्गत आता है ।
नम-भूमि दो प्रकार के होते हैं -
अ. मार्श - वैसे दलदली भाग, जो ग्रीष्मकाल में जलावृत नहीं होते, तथा
ब. स्वाम्प - ये सालों भर (ग्रीष्म काल में भी) जलावृत रहते हैं ।

4- ज्वारीय दलदल

उपरोक्त पेटी के मध्य कुछ निम्न भागों में ज्वार का जल इकठ्ठा हो जाता है, जिसे ज्वारीय दलदल कहा जाता है ।
भारत में नम-भूमि का कुल क्षेत्रफल लगभग 40 लाख हेक्टेयर है ।
भारत में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के निम्न नम-भूमियों का निर्धारण किया गया है -
1. वूलर झील एवं हरीके वैरेज
2. चिलका झील
3. केवलादेव राष्ट्र घाना पक्षी उद्यान, भरतपुर
4. लोकटक झील, मणिपुर, तथा 
5. सांभर झील, राजस्थान नम-भूमि यद्यपि एक प्रकार की अनुपयोगी भूमि मानी जाती है, किन्तु इसका अध्ययन विकास के क्षेत्र में निम्न महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है -
1. बाढ़ नियंत्रण
2. जल की गुणात्त्मकता का नियमन

3. प्रदूषण को कम करना, तथा
4. जलीय - कृषि तथा जलीय जन्तु प्रजनन क्षेत्र के लिए संभाव्य स्थान ।
भारत सरकार ने संरक्षण एवं प्रबन्धन हेतु 21 नम-भूमि क्षेत्रों की पहचान की है ।

5- अम्लीकरण

वन प्रदेशों की मिट्टी को पत्तियों द्वारा प्राकृतिक रूप से अम्ल मिलता रहता है । इसके अतिरिक्त मानवीय क्रियाओं द्वारा भी मिट्टी में अम्ल की मात्रा में वृद्धि होती रहती है । 
भारत में अम्लीय वर्षा की सूचना कई स्थानों से प्राप्त हाती है । उदाहरण के लिए कानपुर औद्योगिक क्षेत्र के कारण अम्लीय वर्षण के कारण कानपुर क्षेत्र में अम्ल की मात्रा अधिक हो गई, फलस्वरूप उस क्षेत्र की मिट्टी अनुपजाऊ हो गई ।  नियंत्रण के उपाय -
अम्लीय वर्षा से बचने के लिए वायु-प्रदूषण पर कठोर नियंत्रण करना होगा ।

6- रिले क्रापिंग

एक ही खेत में वर्ष भर लगातार तीन या उससे अधिक फसलें लेते रहना ही ‘रिले क्रापिंग’ है। रबी की फसल को सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है । सिंचाई के समय मिट्टी के रासायनिक तत्त्व घुलकर मिट्टी की परिच्छेदिका ;वपस च्तवपिसमद्धके निचले संस्तर में जमा हो जाते हैं । गर्मी में खेत के खाली रहने की स्थिति में कृषक खेतों की जुताई कर देता है, जिससे नीचे जमा तत्त्व केशिका क्रिया (Capillry Action) ऊपर आ जाते हैं । इससे मिट्टी में उर्वरा शक्ति पुनः आ जाती है । मिट्टी के रासायनिक तत्त्वों के इस प्राकृतिक चक्रण कद्वारो मृदा-चक्र ;ैवपस ब्लबसमद्ध कहा जाता है । मनुष्य रिले - क्रापिंग द्वारा इस चक्र में बाधा उत्पन्न करता है । वह गर्मी में खेतों को अवकाश नहीं देता । अपितु उन पर जायद की फसलें पैदा करता है जिसके लिए सिंचाई की आवश्यकता होती है । गर्मी में भी खेतों की सिंचाई होते रहने के कारण मिट्टी के उर्वरक तत्त्व वर्ष भर रिसाव द्वारा नीचे जाते रहते हैं । उनको ऊपर आने का अवसर नहीं मिलता । फलस्वरूप मिट्टी अनुपजाऊ हो जाती है ।

7- अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग

ये मृदा को प्रदूषित करते हैं । इन्हीं समस्याओं से बचने के लिए हरी खाद तथा जैव उर्वरक पर अधिक बल दिया जा रहा है ।

8- नगरीय तथा औद्योगिक कचरे का विसर्जन

इनसे भी मृदा में प्रदूषण बढ़ता है ।

 

organic farming: मृदा संरक्षणSoil Conservationजैविक खेती: फ़सलagricare: जैविक कृषि सुरक्षा

डायनासोर के समान इंसान भी विलुप्त हो जाएंगे : अमित बमोरिया

Kisan help - 3 May 2018 - 5:18pm

खेती में कीटनाशकों का भयावह उपयोग, अधिक पैदावारी के लिए यूरिया, डीएपी की अधिकता, नरवाई की आग, सबकुछ जीवों के लिए प्रतिकूल है। पक्षियों में इसका असर दिखाई देने लगा है। वह दिन दूर नहीं, जब इंसान भी डायनासोर के समान विलुप्त हो जाएंगे। मोती की खेती करने वाले अमित बमोरिया ने किसान कल्याण सम्मेलन में बुधवार को बात कहीं।  मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री  माननीय  शिवराज सिंह चौहान  जी के हांथो से पुरुस्कार पाने वाले  मड़ई के पास कामती रंगपुर के ने भविष्य की महामारी की आशंका व्यक्त की , बमोरिया ने कहा खेती में कीटनाशकों का भयावह उपयोग, अधिक पैदावारी के लिए यूरिया, डीएपी की अधिकता, सबकुछ जीवों के लिए प्रतिकूल है   आज किसान आर्थिक रूप से परेशानी  झेल  रहा है. मैंने एक एकड़ जमीन में आठ लाख रुपए कमाए हैं। सरकार कृषि को लाभ का धंधा बनाना चाहती है।

 हमेशा मीडिया  की सुर्खियों  में रहने वाले उन्नत किसान अमित बमोरिया जी ने मोती ,मछली ,बतख , कड़कनाथ मुर्गा  और तालाब के किनारे फल और फूलो  की खेती करके 8 लाख रु कमाए , अमित जी ने बताया  उपरोक्त सभी कार्य एक दुसरे के पूरक है . तालाब के किनारे रेड  लेडी  पपीता (  साल में 70-100  किलो  फलन) , सुगर फ़्री स्टीविआ  आदि की खेती से आय अर्जित  की है ..वही मोती पालन देखने और सीखने देश विदेश से लोग आते रहते है , 
मोती और मछली पालन में तालाब की जरूत होती है जिससे  जमीन में  जल संरक्षण होने से पानी की समस्या से निपटा  जा सकता हे और बहुउदेशीय खेती करके लाखो की कमाई भी की जा सकती है , अमित जी के फार्म पर काला आम , काला टमाटर  , काला  अमरुद  ,सुगर फ्री आम , बारहमासी  आम , मैदानी  सेव , पिस्ता, तेजपत्ता   आदि कई पौधे लगाए है जो आकर्षण  का केंद्र होंगे .

किसानों की आय दोगुना कर किसानों को मजबूत करना चाह रही है। मैंने कामती फार्महाउस में मोती बनाने का कार्य, कड़कनाथ और बटेर पालन शुरू किया। इससे अधिक लाभ मिला। कोई भी किसान आकर देख सकता है।

अमित बामोरिया अब तक सैकड़ो किसानों को मोती पालन की ट्रेनिंग दे चके हैं , मोती पालन के साथ वह सीप भस्म,मोती भस्म ,मछली पालन,बत्तख पालन,मुर्गी पालन की भी ट्रेनिंग देते हैं । 

कृषि वैज्ञानिक डॉ. विकास जैन ने किसानों को बीज की जानकारी दी। बीज तीन के हैं। बीमारी, कीट व फर्टिलिटी बढ़ने से उत्पादन बढ़ेगा और लागत कम लगेगी। जनपद अध्यक्ष मंजू जगदीश अहिरवार, कृषि स्थाई समिति अध्यक्ष फूलवती कुशवाह, भगवान सिंह पटेल, राघवेंद्र पटेल, विधायक प्रतिनिधि चुन्नीलाल पटेल, सहायक संचालक गोविंद मीना व शैलेंद्र राठौर, एसएडीओ आरपी अटारे, बीटीएम आत्मा सुनील बर्डे व किसान मौजूद थे। 

 

Tags: मोतीखेतीपानीसेवपिस्तातेजपत्तामछली पालनबत्तख पालनमुर्गी पालन

सिट्रोनेला (जावा घास) की खेती

Kisan help - 2 May 2018 - 12:04pm

सुगंधित पौधों के वर्ग में मुख्य रूप से जो पौधे हैं, वे हैं – लेमन ग्रास, सिट्रोनेला, तुलसी, जिरेनियम पामारोजा/रोशाग्रास। नींबू घास की दो प्रजातियाँ – सी. फ्लेसुसोयम – भारत में पाई जाती है, जबकि सी. स्टेरिट्स – दक्षिणी पूर्वी देशों में पाई जाती है।

प्रकृति ने हमें सुगन्धित पौधों का अनमोल खजाना प्रदान किया है जिनकी विधिवत खेती और तेल के आसवन से आज हमारे देश में हजारों किसान लाभान्वित हो रहे हैं। इन सुगन्धित पौधों से निकाले गए सुवासित तेल विभिन्न प्रकार की सुगन्धियों के बनाने के अतिरिक्त एरोमाथिरैपी में बहुतायत से प्रयोग किये जाते हैं। लखनऊ स्थित सीएसआईआर के अग्रणी संस्थान केन्द्रीय औषधीय एवं सगन्ध पौधा संस्थान (सीमैप) द्वारा अनेकों ऐसी फसलों के साथ-साथ नींबू घास अथवा (लेमनग्रास) और रोशाघास (पामारोजा) तथा सिट्रोनेला (जावा घास) की उन्नत खेती हेतु कृषि प्रौद्योगिकी व अधिक उपज देने वाली किस्मों का विकास किया गया है। 

जावा घास को जावा सिट्रोनेला के नाम से जाना जाता है, यह बहुवर्षीय सगन्ध पौधा है। इसका सगन्ध तेल सुगन्ध प्रसाधन सामग्री के उत्पादन में प्रयोग किया जाता है। इसका तेल जिरेनियॉल, सिट्रोनेलाल एवं जिरेनियॉल एसीटेट का प्रमुख स्रोत है। विश्व में लगभग 5000 टन सिट्रोनेला तेल का उत्पादन प्रति साल होता है।

जावा घास या सिट्रोनेला सुगन्धित तेल वाली बहुवर्षीय घास है जिसे वैज्ञानिक भाषा में सिम्बोपोगॉन विन्टेरियेनस के नाम से जाना जाता है। इसकी पत्तियों से तेल आसवित किया जाता है। जिसके मुख्य रासायनिक घटक सिट्रेनेलोल, सिट्रोनेलॉल और जिरेनियॉल इत्यादि हैं। इसके तेल का उपयोग सौन्दर्य प्रसाधनों, साबुन, सुगन्ध उद्योग व मच्छर भगाने वाले उत्पादों में बहुतायत से किया जाता है। भारत में सिट्रोनेला का उत्पादन उत्तरी पूर्वी राज्यों के अतिरिक्त महाराष्ट्र में किसानों और उद्यमियों द्वारा किया जाता है। उत्पादक देशों में श्रीलंका, चीन, इंडोनेशिया, भूटान इत्यादि प्रमुख देश हैं। एक अनुमान के अनुसार भारत में सिट्रोनेला की खेती लगभग 2000 हेक्टेयर में की जाती है। जिसके द्वारा लगभग 200 टन तेल उत्पादित किया जाता है।

खेत की जुताई व मिट्टी की तैयारी

सिट्रोनेला की खेती के लिये उत्तर पूर्वी क्षेत्र एवं तराई क्षेत्र की समुचित जल निकास वाली भुरभुरी व अच्छी उर्वरा शक्ति युक्त भूमि उपयुक्त रहती है। भूमि का पीएच 5-7 के बीच सर्वोत्तम रहता है। सिट्रोनेला के लिये भूमि को अच्छी तरह 2 से 3 जुताइयाँ करके पाटा लगा देते हैं इसके उपरान्त आवश्यकतानुसार छोटी-छोटी क्यारियाँ बना ली जाती हैं। 

उर्वरक 

फसल को सन्तुलित मात्रा में सभी प्रकार के सूक्ष्म पोषक तत्वों की आवश्यकता पड़ती है इसलिये 15 से 20 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद एवं एक महीने पूर्व भूमि में अच्छी तरह जुताई के साथ मिला देनी चाहिए। केन्द्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान द्वारा जावा घास की उन्नतशील किस्में सिम-जावा, बायो-13, मंजूषा, मंदाकिनी, जलपल्लवी विकसित की गई हैं। जड़दार कलमों अथवा स्लिप्स को लगभग 50X40 या 60X30 सेंटीमीटर की दूरी पर मिट्टी में अच्छी तरह दबाकर रोपना चाहिए। सामान्यतः इसकी रोपाई फरवरी/मार्च अथवा जुलाई-अगस्त महीने की जाती है।

20 से 25 टन सड़ी हुई गोबर की खाद या 10 से 15 टन वर्मीकम्पोस्ट अन्तिम जुताई के समय खेत में मिला देनी चाहिए। 150:60:60 किग्रा क्रमशः नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश (तत्व के रूप में) प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष देना चाहिए। नत्रजन की मात्रा को 4 बार में बराबर मात्रा में देनी चाहिए तथा फास्फोरस एवं पोटाश लगाने के पूर्व अन्तिम जुताई के समय खेत में मिला देते हैं। पहली सिंचाई पौधरोपण के तुरन्त बाद तथा बाद की सिंचाइयाँ आवश्यकतानुसार करनी चाहिए। अधिक एवं कम पानी का फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है यदि पर्याप्त वर्षा हो रही हो तब सिंचाई न करें। 

 

जलवायु और सिंचाई

जावा घास की बढ़वार के लिए पर्याप्त नवमी की आवश्यकता होती है। अतः जहां वार्षिक वर्षा लगभग 200 से 250 से में होती है, अधिक सिंचाइयों की आवश्यकता नहीं पड़ती, परन्तु उत्तर भारत में दिसंबर से जून तक लगभग 6-8 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है।

निराई कटाई 

फसल स्थापित होने के पहली अवस्था फसल रोपने के लगभग 20 से 25 दिन बाद पहली निराई तथा दूसरी निराई 40 से 45 दिन बाद करना चाहिए। इस प्रकार से लगभग 1 वर्ष में 4 से 5 निराइयों की आवश्यकता होती है। पहली कटाई रोपण 4-5 माह बाद और इसके बाद तीन माह के अन्तराल पर वर्ष में 3-4 कटाइयाँ करते रहना चाहिए। जमीन से 15-20 सेंटीमीटर की ऊँचाई पर कटाई करनी चाहिए। जावाघास के शाक का वाष्प आसवन या जल आसवन कर तेल प्राप्त करते हैं। इसकी शाक को काटकर अर्द्ध मुरझाई अवस्था में आसवित करते हैं। 

जावा घास का सम्पूर्ण आसवन करने में लगभग 3 से 4 घंटे लगते हैं। जावा घास की बायो-13 प्रजाति से पाँच वर्ष की फसल के आधार पर तेल की उपज 200-250 किग्रा प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष प्राप्त हो जाती है। विभिन्न कृषि कार्यों व आसवन पर व्यय लगभग रुपए 40,000 से 45,000 प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष होता है तथा कुल आय रुपए 1,60,000/- से 2,00,000/- प्रतिवर्ष तथा शुद्ध लाभ औसत रुपए 1,20,000 से 1,60,000 प्रतिवर्ष प्राप्त होती है।

organic farming: सिट्रोनेलाजैविक खेती: औषधिबागवानीफ़सल

गेहूं की कटाई के बाद तैयार करें हरी खाद

Kisan help - 20 April 2018 - 12:38pm

गेहूं की कटाई के बाद किसान को खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए हरी खाद तैयार करनी चाहिये।गेहूं 30 अप्रैल तक पूरी तरह से कट जाएगा। इसके बाद ज्यादातर खेत खाली पड़े रहते है। जिसमें किसान ढैंचा, सन, आदि की उपज लेकर हरी खाद ले सकते हैं। किसान भाई तीसरी फसल के रूप में मूंग (दलहन) की खेती कर सकते है। यह फसल 65-70 दिनों में तैयार हो जाती है। इससे भूमि की उर्वरा शक्ति भी बढ़ती है। इस दौरान किसान चाहे तो तीसरी फसल के रूप में सूरजमुखी (तिलहन) की खेती कर सकते है।

किसान हैल्प के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं जाने माने जैविक प्रचारक डॉ. आर.के.सिंह जी का मानना है कि " धान-गेहूं फसल चक्र में एक तीसरी फसल के रूप में मूंग को जोड़कर फसलों की उत्पादकता, लाभ एवं संसाधन उपयोग दक्षता को बढ़ाया जा सकता है। वहीं, धान के स्थान पर मक्का उगाने पर फसल उत्पादकता में 82-89 प्रतिशत सिंचाई जल की खपत में कमी, 49-66 प्रतिशत ऊर्जा खपत में कमी एवं 13-40 प्रतिशत वैश्विक तपन क्षमता में कमी लाई जा सकती है। इसके अलावा 0.7 टन प्रति हैक्टेयर अधिक धान समतुल्य उत्पादकता से 27-73 प्रतिशत तक अधिक लाभ कमाया जा सकता है। भूमि के घटते जलस्तर और श्रम की कमी से निपटने के लिए फसल विविधिकरण एवं खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से बिना जुताई वाले खेतों में अवशेषों को हटाए बिना मक्का-गेहूं-मूंग फसल चक्र एक अच्छा विकल्प हो सकता है।"

organic farming: हरी खादजैविक खेती: दलहनफ़सलagricare: जैविक खाद

ग्लैडिओलस की खेती

Kisan help - 13 April 2018 - 1:08pm

 

शल्ककन्दीय फूल के रूप में ग्लैडिओलस विश्व स्तर पर कट-फ्लावर के रूप में उगाया जाता है। भारत में इसकी खेती बंगलुरु, श्रीनगर, नैनीताल, पुणे व उटकमण्डलम में वृहत रूप से होता है। झारखण्ड के धनबाद में अब इसकी खेती छोटे पैमाने पर आरम्भ हो चुकी है। इसकी खेती गृह बाजार तथा निर्यात, दोनों हेतु किया जाता है। शीतकाल में ग्लैडिओलस का यूरोपियन देशों में निर्यात किया जाता है। जिसके कारण काफी विदेशी मुद्रा का अर्जन होता है।

 
 
किस्म

रंग के आधार पर इसके कई किस्म पाये जाते हैं। उगाए जाने योग्य अधिकतर किस्म जैसे मेलोडी, ट्रॉपीक, सिज, स्नो, प्रिन्स, फ्रेंडशीप, एप्पल, ब्लॉसम, किंग लियर इत्यादि नीदरलैंड में विकसित किये गए हैं। सागर, श्रीदूर, शक्ति, अग्निरेखा, श्वेता, सुनयना, नीलम, चिराग, बिंदिया, अंजली, अर्चना इत्यादि भारत में विकसित की गई है।

 
 
पादप प्रवर्धन

ग्लैडिओलस बीज, कंद व उत्तक संवर्धन द्वारा उगाए जाते हैं। उच्च गुणवत्ता के कंद विकसित करने के लिये 10-15 से.मी. की दूरी पर अवस्थित पंक्तियों में 5 से.मी. की दूरी पर छोटे कंदों को लगाया जाता है। जिससे प्रति हेक्टेयर 4-5 लाख बड़े कंद प्राप्त किये जाते हैं।

 
 
मृदा व जलवायु

ग्लैडिओलस की खेती के लिये भूमि का पी.एच. मान 5.5-6.5 रहना चाहिए। बलुआही, दोमट, पोषक तत्वों से भरपूर अच्छी जलनिकास वाली भूमि अच्छी होती है। पी.एच. ठीक करने हेतु चूना अथवा डोलोमाइट का प्रयोग करना चाहिए। इसकी खेती 15-25 सेंटीग्रेड तापमान तथा पर्याप्त प्रकाश में सबसे अच्छे तरीके से सम्भव है। बहुत ज्यादा आर्द्रता रोगों को बढ़ावा देता है।

 
 
जमीन की तैयारी

कंदों की रोपाई से करीब दो माह पूर्व 25-30 सेंटीमीटर की गहराई तक जमीन जोत लें एवं 40-50 टन प्रति हेक्टेयर कम्पोस्ट मिट्टी में मिला दें। रोपाई से 15-20 दिन पूर्व दूसरी जुताई कर दें।

 
 
कंद की रोपाई

2.5-4 सेंटीमीटर आकार के बड़े कंदों से शल्क को हटाकर 2.5 ग्राम डाइथेन एम- 45, 1 ग्राम बैविस्टिन प्रति लीटर पानी में घोलकर उपचारित करें। रोपाई की दूरी 10-20 से.मी. रखी जाती है। रोपाई की गहराई बड़े फूल वाले किस्मों हेतु 15 से.मी. व छोटे हेतु 5 से.मी. रखें।

 
 
रोपाई का समय

सितम्बर-नवम्बर (वर्षा ऋतु खत्म होने के बाद)

 
 
उर्वरक

अच्छे पुष्प उत्पादन हेतु 70-80 किलो नत्रजन, 100-110 किलो स्फूर तथा 60-65 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर उपयोग में लाना चाहिए। 4-5 पत्तों के अवस्था में दूसरी बार 60 किलो नत्रजन, 120 किलो स्फूर व पोटाश का उपयोग किया जाता है।

 
 
सिंचाई

ग्लैडिओलस को काफी सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। रोपाई के पश्चात तुरन्त काफी परिमाण में सिंचाई की जाती है। गर्म मौसम में प्रति सप्ताह 2-3 सिंचाई की जाती है।

 
 
देखभाल

पौधों के जड़ों के आस-पास निराई-गुड़ाई कर मिट्टी चढ़ा दी जाती है। पुष्प आने तक खेत को खरपतवार विहीन रखें। डायूरॉन अथवा ट्रायफ्लूरालीन का उपयोग भी खरपतवार को नियंत्रित करने में प्रभावी होता है।

 
 
फूलों की तुड़ाई

रोपाई के 60-110 दिन बाद ग्लैडिओलस के पुष्प खिलते हैं। पुष्प की तुड़ाई प्रातः काल में की जाती है। तुड़ाई तेजधार चाकू से भूमि से 10-15 सेंटीमीटर ऊपर से की जाती है। तत्काल पुष्पगुच्छ को जल में स्थानान्तरित कर दिया जाता है।

ढुलाई के समय पुष्पगुच्छ को हमेशा खड़ा रखा जाता है। तुड़ाई के पश्चात तुरन्त इनका तापक्रम 2-5 डिग्री सेंटीग्रेड तक कम कर दिया जाता है। बाजार को ध्यान में रखकर 5 पुष्पगुच्छ का बंच बनाया जाता है। पैकेजिंग निर्यातक के माँग के अनुसार किया जाता है।

 
 
पुष्प उत्पादन

2-3 लाख पुष्पगुच्छ प्रति हेक्टेयर

 
 
पादप संरक्षण

रोग-कीट नियंत्रण हेतु हमेशा रोधी किस्म का व्यवहार, साफ-सुथरी खेती, रोग-कीट मुक्त व उपचारित बीज/कंद का प्रयोग किया जाता है। कवक जनित रोग नियंत्रण हेतु कंदों को बैविस्टिन का 2 ग्राम 1 लीटर पानी में घोलकर उपचारित कर लिया जाता है। जड़ों के पास सड़न बीमारी से बचाव हेतु कंदों को गर्म पानी अथवा बैविस्टिन का 2 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी के घोल से उपचारित किया जाता है। कंदो के सड़न बीमारी से बचाव हेतु मिथाइल ब्रोमाइड द्वारा भूमि शोधन किया जाता है।

डैम्पींग आॅफ रोग व पर्णधब्बा बीमारी से बचाव हेतु 2.5 डायथेन एम-45 एक लीटर पानी में घोलकर छिड़काव किया जाता है। विषाणु जनित रोगों से बचाव हेतु रोग रहित कंद का प्रयोग किया जाता है तथा असर नजर आने पर तत्काल अस्वस्थ पौधों को उखाड़कर हटा दिया जाता है। लाही कीट को नियंत्रित करने से विषाणु जनित रोग भी नहीं फैलते। लाल मकड़ी के फैलने पर पत्ते व पुष्प दोनों प्रभावित होते हैं। पत्ते सिल्वर रंग के हो जाते हैं। इन कीटों के नियंत्रण हेतु नुवाक्राॅन (0.1-0.15 प्रतिशत) तथा केलथेन (0.025-0.04 प्रतिशत) का उपयोग लाभप्रद होता है।

 
शल्ककन्दीय फूल के रूप में ग्लैडिओलस विश्व स्तर पर कट-फ्लावर के रूप में उगाया जाता है। भारत में इसकी खेती बंगलुरु, श्रीनगर, नैनीताल, पुणे व उटकमण्डलम में वृहत रूप से होता है। झारखण्ड के धनबाद में अब इसकी खेती छोटे पैमाने पर आरम्भ हो चुकी है। इसकी खेती गृह बाजार तथा निर्यात, दोनों हेतु किया जाता है। शीतकाल में ग्लैडिओलस का यूरोपियन देशों में निर्यात किया जाता है। जिसके कारण काफी विदेशी मुद्रा का अर्जन होता है।

organic farming: ग्लैडिओलसजैविक खेती: औषधिबागवानीफ़सलagricare: जैविक खाद

अब गन्ना एवं चीनी आयुक्त ने भी माना कि कोरॉजन के प्रयोग से गन्ना किसानों को होगा नुकसान

Kisan help - 5 April 2018 - 5:45pm

किसान हेल्प के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ.आर.के. सिंह ने जो बात 4अक्टूबर 2015 को अपने के किसान  जागरूपता अभियान में कही आज वही बात उत्तर प्रदेश के गन्ना एवं चीनी आयुक्त  श्री संजय आर. भूसरेड्डी ने कही । डॉ.आर.के. सिंह ने कोराजन को  जीवन और जमीन दोनों के लिए घातक बताया था ।उन्होंने कोराजन से होने वाले नुकसान तथा कुछ किसानों के प्रत्यक्ष प्रमाण भी दिय जिन्होंने अपनी जमीन को सुधारने के लिए डॉ.आर.के.सिंह से सलाह ली और कोराजन के दुष्प्रभाव से बचाया । 
 
किसान अपनी फसल में कोरॉजन कीटनाशक के प्रयोग से बचें, कोरॉजन कीटनाशक के अधिक प्रयोग से किसानों को आर्थिक नुकसान के साथ-साथ मृदा स्वास्थ्य को भी नुकसान होगा।" यह सलाह उत्तर प्रदेश के गन्ना एवं चीनी आयुक्त संजय आर. भूसरेड्डी ने गन्ना किसानों को दी है।

उन्होंने आगे बताया, "विभिन्न संस्थानों की वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार कोरॉजन कीटनाशक का इस्तेमाल केवल दीमक एवं कंसुआ और टॉप बोरर नियंत्रित करने के लिए किया जा सकता है। ऐसे में कंपनी को गलत प्रचार के लिए नोटिस दिया जाएगा।"

उन्होंने बताया, "कोरॉजन कीटनाशक कंपनी DuPont विभिन्न प्रचार माध्यमों से गन्ने की फसल के अधिक पैदावार के सम्बन्ध में झूठा प्रचार कर रही है। ऐसे में गन्ने की फसल में लगने वाले कीटों में नियंत्रण के लिए अत्यधिक कीटनाशकों के असंतुलित प्रयोग से किसान बचें।"
भूसरेड्डी ने गन्ना किसानों को सलाह देते हुए कहा, "कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार फसल वर्ष में एक ही बार कोरॉजन का प्रयोग फसल में करना बेधक कीटों पर नियंत्रण के लिए काफी है क्योंकि इस कीटनाशक का प्रभाव काफी समय तक रहता है। ऐसे में किसानों को इसका अधिक प्रयोग नहीं करना चाहिए।"

उन्होंने कहा, "यह कीटनाशक काफी घातक श्रेणी का रसायन है, जिसका फसल की मिट्टी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।" बता दें कि किसानों को कोरॉजन कीटनाशक को प्रचार के जरिए बताया जा रहा है कि कोरॉजन के प्रयोग से गन्ना अधिक मोटा और लंबा होता है और यह लगातार बढ़ता रहता है। कोरॉजन एक महंगा कीटनाशक है।
भूसरेड्डी ने गन्ना किसानों को सलाह देते हुए कहा, "कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार फसल वर्ष में एक ही बार कोरॉजन का प्रयोग फसल में करना बेधक कीटों पर नियंत्रण के लिए काफी है क्योंकि इस कीटनाशक का प्रभाव काफी समय तक रहता है। ऐसे में किसानों को इसका अधिक प्रयोग नहीं करना चाहिए।"

उन्होंने कहा, "यह कीटनाशक काफी घातक श्रेणी का रसायन है, जिसका फसल की मिट्टी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।" बता दें कि किसानों को कोरॉजन कीटनाशक को प्रचार के जरिए बताया जा रहा है कि कोरॉजन के प्रयोग से गन्ना अधिक मोटा और लंबा होता है और यह लगातार बढ़ता रहता है। कोरॉजन एक महंगा कीटनाशक है।

डॉ.आर.के. सिंह ने गन्ना एवं चीनी आयुक्त संजय आर. भूसरेड्डी को धन्यवाद दिया उन्होंने कहा यह मुहीम हम 2015 से प्रयास कर रहें हैं आपने हमारी मुहिम को तेजी दी है हमें आशा है कि किसान अब कोराजन जैसी कम्पनी के गलत प्रभाव से बचेंगे। साथ ही उन्होंने सरकार से कोराजन पर तत्काल प्रतिबन्ध की बात कही ।

Tags: कोराजनकिसानकीटनाशकगन्ना किसानगन्ना

कब आएंगे किसानों के ‘अच्छे दिन’?

Kisan help - 3 April 2018 - 12:26pm

भारतीय अर्थव्यवस्था प्राचीन काल से ही कृषि आधारित रही है। यहां उन्नत कृषि संस्कृति भी रही है। तभी तो यहां ‘उत्तम कृषि, मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान’ की लोकोक्ति प्रचलित थी जिसमें कृषि को सर्वोत्तम बताया गया। किसानों को सम्मानपूर्वक ‘अन्नदाता’ कहा गया है। किंतु अंग्रेजों के शासनकाल में दोषपूर्ण भूमि व्यवस्था के दुष्परिणाम भारतीय किसानों ने भुगते हैं। कृषि प्रधान भारत के 90ः किसान इस दौरान जमींदारी प्रथा के कारण भूमि की उपज के सुख से वंचित थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भूमिधर कम थे एवं भूमिहीन ज्यादा, खेती के पिछड़ेपन के कारण प्रति हेक्टेअर उत्पादन बहुत कम था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरकार ने कृषि उत्पादन बढ़ाने एवं उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए कुछ प्रयास जरूर किए हैं- सिंचाई के लिए नहरों, ट्यूबवेल का निर्माण, रासायनिक खाद, उन्नत बीज, कीटनाशक औषधि, आधुनिक खेती की जानकारी, बैंकों से ऋण आदि की व्यवस्था। इससे कुछ बड़े किसानों के दिन सुधरे हैं किंतु बहुसंख्यक छोटे किसान आज भी जीवन की मौलिक सुविधाओं से वंचित हैं। किसान की संख्या घट रही है और खेतिहर मजदूरों की संख्या बढ़ रही है और खेती छोड़कर वे नौकरी की खोज में शहर की ओर पलायन कर रहे हैं। भूख और प्यास से मौत जब मुहाने पर खड़ी दिखती है तो शहर की ओर पलायन करना मजबूरी हो जाती है। आज पंजाब के किसान खेती करने के लिए आस्ट्रेलिया एवं कनाडा जा रहे है, इसी प्रकार, बिहार, उत्तर प्रदेश के किसान पंजाब जा रहे हैं क्योंकि उन्हें वहां बेहतर सुविधाएं मिलती हैं। तो बिहार और उत्तर प्रदेश में खेती कौन करेगा? किसानों को अपने गांव में ही बेहतर सुविधाएं देना समय की मांग है।

 
किसानों की समस्याएं अनगिनत हैं। आज भी हमारे किसान खेती के लिए प्रकृति पर आश्रित हैं। उन्नत बीज, रासायनिक खाद, उचित सिंचाई व्यवस्था, खेती की आधुनिक तकनीकें, पैदावार के भंडारण, प्रसंस्करण और मार्केटिंग की सुविधाएं आम किसान की पहुंच से दूर हैं। बाढ़, सूखा, जलवायु परिवर्तन, कीटों एवं जानवरों द्वारा फसल की बर्बादी, कम उत्पादन, रोजगार की कमी, खराब कार्यदशाएं, सरकारी निवेश की कमी, खाद-बीज-सिंचाई का खर्चा दिनानुदिन बढ़ने के कारण लागत में वृद्धि, उत्पाद मूल्य में कमी, कम आय, यूनियन का अभाव, कम ब्याज एवं आसान शर्तों पर ऋण की अनुपलब्धता जैसी समस्याएं उनके जीवन का अंग बन चुकी है। पानी के अभाव में किसान कम खेतों में ही फसल की बुआई कर पाते हैं, उसे भी प्रायः नीलगाय एवं जंगली सूअर नष्ट कर देते हैं। पिछले वर्ष बिहार सरकार ने लगभग तीन हजार नीलगायों को गोली से मरवा दिया जबकि उसे पशु शिविर में लाकर नियंत्रित भी किया जा सकता था। आखिर पशु भी हमारी तरह प्रकृति का हिस्सा हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति, पशु और इंसान एक-दूसरे के पूरक हैं, दुश्मन नहीं।

 
सरकारी तौर पर जो थोड़ी-बहुत सुविधाएं किसानों को दी जा रही हैं, अशिक्षा एवं गरीबी के कारण वे उनका पूर्णतः लाभ नहीं उठा पाते। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) के अनुसार देश के आधे से ज्यादा किसानों को सरकार द्वारा निर्धारित ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ व्यवस्था की जानकारी ही नहीं है और जिनको इसकी जानकारी है उनके आसपास सरकारी विक्रय केन्द्र ही नहीं है परिणामस्वरूप वे बिचैलियों के हाथों अपने उत्पाद औने-पौने दाम पर बेचने को विवश हैं। किसानों की सबसे बड़ी समस्या है उनको पैदावार से मिलने वाली कम कीमत। कृषि उत्पाद की उपभोक्ता के स्तर की कीमत और किसान के स्तर की कीमत में 50 से 300 प्रतिशत तक का अंतर होता है। किसान को एक किलो दाल के प्रायः 50 रुपए मिलते हैं पर दाल बेचने वाली कंपनी को 150 रुपए मिलते हैं। मेहनत किसान करता है और फायदा बिचैलिया या व्यापारी ले जाता है। सरकार को इस विसंगति को दूर करने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। फसल कम हो या बहुत ज्यादा हो, नुकसान किसानों को ही उठाना पड़ता है। बंपर फसल की स्थिति में फसल की कीमत बहुत कम हो जाती है एवं कम फसल की स्थिति में सरकार विदेशों से उसे आयात करती है, इससे भी फसल की कीमत कम हो जाती है।

 
मोदी सरकार के वर्ष 2016-17 के लिए खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि का कदम अच्छा है, लेकिन किसानों को उनकी बदहाली से बाहर निकालने के लिए यह पर्याप्त नहीं है। गेहूं और कपास की कीमतों में प्रति क्विंटल 60 रुपए, ज्वार तथा बाजरे की कीमतों में प्रति क्विंटल 55 रुपए तथा मक्के की कीमतों में 40 रुपए प्रति क्विंटल की मामूली वृद्धि की गई। फल-सब्जी का तो कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य होता ही नहीं है। जब फसलों के दाम समुचित नहीं बढ़ेंगे तो किसानों की न तो क्रय शक्ति बढ़ पाएगी और न ही उनके जीवन स्तर में कोई सुधार ही होगा। इधर पिछले कुछ सालों से दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतें काफी तेजी से बढ़ी हैं। वर्ष 2001 से अबतक दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतों में लगभग 400 प्रतिशत का इजाफा हुआ है, रासायनिक खादों के औसतन दाम 300 रुपए प्रति क्विंटल से बढ़कर 1400 रुपए हो गये हैं तथा कीटनाशकों के औसतन दाम 100 रुपए से बढ़कर 400 रुपए हो गए हैं। अन्य वस्तुओं के दामों में इतनी वृद्धि के बावजूद कृषि उत्पादों की कीमतों में इन वर्षों में मात्र 75 प्रतिशत की वृद्धि ही हुई है। इसके परिणामस्वरूप किसान अब न्यूनतम समर्थन मूल्य या लागत मूल्य को अपर्याप्त मानकर ‘समता मूल्य’ की मांग करने लगे हैं जिसे किसी भी पुराने वित्त वर्ष को आधार वर्ष मानकर अन्य वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य में हुई वृद्धि के अनुपात से किसानों को ‘समता मूल्य’ दिया जा सकता है। इससे किसान संपन्न और खुशहाल होंगे। यह भी सच है कि किसी भी व्यवसाय में सिर्फ लागत मूल्य प्राप्त होने से काम नहीं चलता। लाभ किसी भी व्यवसाय में जरूरी होता है। दुर्भाग्यवश लाभकारी मूल्य किसानों को अबतक नसीब नहीं हुआ है। इससे बाध्य होकर किसान धीरे-धीरे खेती छोड़ रहे हैं और अनुमानतः प्रतिवर्ष लगभग 30 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि खेती के दायरे से बाहर होती जा रही है। कृषि क्षेत्र में जान फूंकने के लिए जरूरी है कि किसानों की आय बढ़ाना सुनिश्चित किया जाए। चूँकि न्यूनतम समर्थन मूल्य में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी करने से महंगाई बढ़ेगी इसलिए सरकार किसानों को उनके उत्पाद के हिसाब से समुचित सब्सिडी देकर इस समस्या से छुटकारा दिला सकती है। इससे बेहतर कोई सटीक विकल्प नहीं है। इससे किसान भी खुशहाल होंगे और अन्य देशवासी भी महंगाई की मार से बचेंगे।

 
कहा जाता है कि छोटा किसान कर्ज में जन्म लेता है, सहकारी-प्रथा में जीवन-भर पिसता है और कर्ज में डूबकर मर जाता है। एनएसएसओ के अनुसार पिछले 11 वर्षों में कर्ज से दबे किसानों की संख्या 51.9ः है, 40.2ः किसानों को सेठ और साहूकार से 24 से 60ः वार्षिक ब्याज पर कर्ज लेना पड़ता है। उसे उम्मीद होती है कि वह ऋण खेती की आय से चुका देगा, पर खेती उसे प्रायः दगा देती है। समय बीतता जाता है और ब्याज बढ़ता जाता है फिर इसकी कीमत किसान को अपनी जमीन बेचकर या आत्महत्या करके चुकानी पड़ती है। कैसी विडम्बना है कि किसान अपना सारा जीवन परोपकार में बिता देते हैं पर उनके जीवन के सुरक्षा की चिंता किसी को भी नहीं होती। वर्ष 2004 से अबतक 1,63,795 किसानों ने आत्महत्या की जो कि हत्या प्रतीत होती है। हर आत्महत्या में जीवन के आखिरी क्षण तक खुद को बचाने की एक खामोश पुकार होती है, जिसे शायद कोई समझ नहीं पाता। मुसीबत की घड़ी में यदि किसी ने उसे सहारा दिया होता, तो शायद उसका फैसला बदल सकता था।

 
जब सभी राजनीतिक दल सचमुच किसानों के मुद्दे पर वोट बैंक की राजनीति करने की बजाय एकजुट होकर किसानों के हक की लड़ाई लड़ें, तो उनके ‘अच्छे दिन’ आ सकते हैं। खेती के लिए किसान द्वारा प्रयुक्त खाद, बीज, पानी, बिजली, डीजल, ट्रैक्टर, कुदाल, थे्रसर आदि का मनमाना कीमत कोई और तय करता है किंतु किसान को अपने फसल की कीमत स्वयं निर्धारित करने का भी अधिकार नहीं है। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि खेती में लागत बढ़ती है और आमदनी घटती है। यदि कृषि को उद्योग का दर्जा दे दिया जाए तो किसान को अपनी फसल की कीमत निर्धारित करने का अधिकार मिल जाएगा।

 
वास्तव में, भारत तीन इंजन का एयरक्राफ्ट है जिसमें पहला इंजन इंडस्ट्री है, दूसरा हृयूमन डेवलपमेंट यानी शिक्षा व स्वास्थ्य और तीसरा रूरल डेवलपमेंट यानी किसान व खेती। अभी तक हम सिर्फ इंडस्ट्री के सहारे उड़ान भर रहे हैं, जिस दिन बाकी दोनों इंजन भी खोल दिए गए तो हम दुनिया में नंबर एक होंगे। हमारे पिछड़ने का मूल कारण यही है कि जो हमारा सबसे बड़ा आर्थिक समृद्धि का स्रोत हो सकता है यानी किसान, उसकी ओर हमने सबसे कम ध्यान दिया। किंतु मोदी सरकार ने किसानों की समस्याओं पर विशेष ध्यान देना शुरू किया है। ‘ग्राम उदय से भारत उदय’ अभियान केन्द्र सरकार की नेक नियति को दर्शाता है। ‘अन्नदाता सुखी भवः’ के मंत्र के साथ कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों को शुरू किया गया है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, मृदा परीक्षण कार्ड, पशुपालन/मत्स्य पालन, फसल चक्र, नीम कोटेड यूरिया, किसान चैनल, ई-मंडी, जल संरक्षण, ‘पर ड्राॅप मोर क्राॅप’, वनीकरण, भूमिक्षरण की रोकथाम, ग्रामीण विद्युतीकरण को बढ़ावा, मनरेगा का विस्तार, सब्सिडी सीधा किसानों के खाते में देने जैसी पहल किसानों की दशा और दिशा, दोनों में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती है। अभी लगभग 75ः किसान फसल बीमा के दायरे से बाहर हैं। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में बीमा प्रीमियम की राशि बहुत कम कर दी गई है जैसे कि रबी फसलों पर 1.5 प्रतिशत, खरीफ पर दो प्रतिशत और व्यावसायिक अथवा बागवानी खेती पर पांच प्रतिशत। इससे किसान बीमा लेने में प्रोत्साहित होंगे और अपने को संकट मुक्त करने में भी सक्षम होंगे।

 
अभी देश की सकल आय में कृषि, वानिकी और मतस्य पालन का योगदान मात्र 17.5 प्रतिशत है जबकि कुल रोजगार का 49 प्रतिशत इस क्षेत्र से सृजित होता है। इसका सीधा सा मतलब हुआ कि बहुत ज्यादा लोग बहुत कम कमा रहे हैं। इसी की परिणति हमें प्रति व्यक्ति कम आय और गरीबी में दिखाई देती है। इसलिए किसानों की आय में वृद्धि करना सबसे जरूरी है। केन्द्र सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का सपना देखा है। इसके लिए अगले छह वर्षों में कृषि वृद्धि दर को 12 प्रतिशत से ऊपर रखना होगा। यह मुश्किल जरूर है किंतु इरादा अगर अटल हो तो यह असंभव नहीं है। मध्य प्रदेश यदि 12 प्रतिशत कृषि विकास दर हासिल कर सकता है तो अन्य राज्य क्यों नहीं? इसमें सरकार के साथ-साथ हम सबकी जिम्मेदारी भी बनती है। हर नई तकनीक, नए उपकरण, नए प्रयोग, नई स्कीम पर किसानों को दिलचस्पी लेनी चाहिए। किसान अधिक उपज के लालच में अंधाधुंध तरीके से रासायनिक खादें एवं कीटनाशक का प्रयोग कर रहे हैं जिससे देश में कैंसर ने महामारी का रूप धारण कर लिया है। हर रात अबोहर (पंजाब) से बीकानेर (राजस्थान) के लिए एक गाड़ी चलती है जिसका नाम ही लोगों ने ‘कैंसर ट्रेन’ रख दिया है। किसान जैविक खादों का इस्तेमाल करने के साथ-साथ कृषि की अन्य आधुनिक विधियां अपनाएं जिनसे पानी भी कम लगे और उन्नत किस्म की बीजों के इस्तेमाल एवं फसल चक्र अपनाने से अधिक पैदावार भी प्राप्त हो और किसी भी प्रकार का प्रदूषण भी उत्पन्न न हो। कृषि में शोध हो, ‘ड्राइ-लैंड फार्मिंग’ की तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाया जाए जिससे बरसात पर निर्भरता कम हो। इसी तकनीक से ब्राजील एवं रेगिस्तान जैसे इजरायल में कृषि क्रांति आया है। किसानों को मांग के अनुसार पैदावार करनी चाहिए। आज हर्बल उत्पादों की मांग दुनिया भर में है। भारत के मौसम और मिट्टी अलग-अलग इलाकों में तरह-तरह की जड़ी बूटियों की खेती में मददगार हैं। यह कुदरत की देन है। किसान तरह-तरह की जड़ी-बूटियों की खेती कर अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं। मोदीजी का विचार इस मायने में आशाजनक है कि वे खुद कुछ न कुछ नया करते रहते हैं। हर क्षेत्र में लीक से हटकर कुछ नए प्रयोग हों, वे यह चाहते हैं। सरकारें, पंचायती राज संस्थाएं, वित्तीय और कृषि से जुड़े संस्थान मिल कर किसानों की कायापलट कर सकती हैं।

 

किसानों के उद्धार के लिए कई योजनाएं तो पहले भी रही हैं किंतु पर्याप्त बजट के अभाव में वह सफल नहीं हुई हैं। नोटबंदी के दौर में किसानों को अपने उत्पादों की बहुत कम कीमत मिली है एवं उनकी स्थिति बद से बदतर हो गई थी। इसे देखते हुए मोदी सरकार ने केन्द्रीय बजट में कृषि एवं इससे जुड़े क्षेत्रों के खर्च में अभूतपूर्व 24ः की बढ़ोत्तरी की है। वित्त मंत्री ने बजट में कृषि की आधारभूत संरचना में निवेश बढ़ाने की बात कही है। मनरेगा के लिए बजट राशि बढ़ा दी गई है। मनरेगा के अंतर्गत उत्पादक कार्य करने पर जोर रहेगा, ग्रामीण सड़कों का विस्तार किया जाएगा। गांवों के विद्युतीकरण के लिए अधिक धन उपलब्ध कराया गया है। कृषि में निवेश बढ़ने से कृषि उत्पादन लागत कम होगी एवं उत्पादन ज्यादा होगा, परिणामतः किसानों की आय बढ़ेगी। अभी तक महंगी दरों पर कर्ज ही किसानों की आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण रहा है। इसलिए अधिक से अधिक किसानों को बैंकों से कम ब्याज पर कर्ज देने का अब तक का सबसे बड़ा लक्ष्य इस बजट में रखा गया है। इससे किसान सेठ-साहूकारों से महंगा कर्ज लेने से बच पाएंगे और कर्ज को आमदनी में बदल पाएंगे। खेती के लिए सबसे जरूरी चीज पानी के लिए बड़े पैमाने पर तालाब बनाने की योजना है। अभी लगभग 22ः फल-सब्जी उचित रखरखाव के अभाव में बर्बाद हो जाते हैं। इसलिए कांट्रेक्ट फार्मिंग की बात बजट में की गई है ताकि फल, सब्जी जैसे जल्दी खराब होने वाले फसल को बचाया जा सकेगा। साथ ही, फसल बीमा योजना का दायरा बढ़ाकर 40ः कर दिया गया है जो सराहनीय है। नोटबंदी से सरकार के पास पर्याप्त धन की व्यवस्था हो गई है इसलिए किसानों की इतनी विशालकाय समस्या को देखते हुए ‘कर्जा माफी’ एवं जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न मौसम की अनिश्चितता एवं इसके परिणामस्वरूप आय की अनिश्चितता से बचाने के लिए ‘फिक्स्ड इनकम स्कीम’ की उम्मीद किसान कर रहे हैं। तभी वित्त मंत्री का अपने बजट भाषण में कविताई ‘‘हम आगे-आगे चलते हैं आ जाइये आप’’ का अनुसरण करते हुए किसान उनके पीछे चलेंगे।

 

 

खेती-किसानी का एक सूखा तो खत्म हुआ

Kisan help - 31 March 2018 - 10:45pm

यह शायद सबसे बड़ी नीतिगत घोषणा है। केंद्र सरकार द्वारा बजट में किसानों को उनकी फसलों के लागत मूल्य का डेढ़ गुना ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ दिए जाने की घोषणा से अब तक के हताश किसानों में उत्साह का संचार होगा। सरकार की इस घोषणा से चुनाव पूर्व किया गया वादा भी निभाया गया प्रतीत हो रहा है। वर्ष 2017 मंदसौर, यवतमाल व विदर्भ के किसान असंतोष का गवाह बना। तमिलनाडु के किसान संगठनों ने तो दिल्ली के बोट क्लब पर कई सप्ताह तक धरना दिया और लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए कई नाटकीय तरीके अपनाए। देश के बाकी हिस्सों का हाल भी कोई बहुत अच्छा नहीं था। एक के बाद एक तकरीबन पूरे देश से ही किसानों द्वारा आत्महत्या की खबरें आती रहीं। इसी वर्ष उपचार के अभाव में सैकड़ों शिशुओं की मृत्यु दिल दहलाने वाली घटना बनी है। इस लिहाज से देश के कृषि और स्वास्थ्य क्षेत्र को बजट से काफी उम्मीदें थीं। वित्त मंत्री के बजटीय भाषण में खेती-किसानी के मुद्दों की विशेष चर्चा व प्रावधान से कृषकों में सरकार के प्रति संवेदना का संचार हुआ है। 

बजट 2018 में किसानों को कर्ज के लिए 11 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है, जो पिछले बजट की तुलना में लगभग एक लाख करोड़ अधिक है। सिंचाई के लिए 2,600 करोड़ रुपये की घोषणा की गई है। इसके साथ ही हमें यह भी देखना होगा कि केंद्र सरकार का पिछला बजट भी किसानों के लिए खास था, पर इस बार बजट में ग्रामीण भारत को सर्वाधिक तवज्जो दिया जाना सबसे बड़े जनसंख्या समूह का सम्मान है। वित्त मंत्री ने जिस तरह ग्रामीण जीवन शैली को आसान बनाने, किसानों की आय दोगुनी करने तथा कृषि को संकट से उबारने के वायदे किए, वह कृषि की कैंसर रूपी बीमारी की बड़ी शल्य चिकित्सा है। हाल के दिनों में देश भर के आलू, प्याज और टमाटर उत्पादकों की पीड़ा को महसूस करते हुए सरकार द्वारा ‘ऑपरेशन ग्रीन’ का प्रावधान इन उत्पादकों को राहत देने वाली है। इसके साथ ही 42 मेगा फूड पार्कों की स्थापना, जैविक खेती को बढ़ावा, 22 हजार कृषि हाट का निर्माण, पशुपालकों को क्रेडिट कार्ड आदि का प्रावधान किसानों के नजरिये से काफी उत्साहवद्र्धक कदम हैं। 

फसलों के दामों में भारी इजाफे के साथ ही गरीबों व मजदूरों के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना नए बजट की सबसे बड़ी सौगात है। इस व्यवस्था के तहत दस करोड़ परिवारों यानी तकरीबन 50 करोड़ लोगों को पांच लाख रुपये सालाना का स्वास्थ्य बीमा प्रदान किए जाने का प्रावधान है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 86 फीसदी ग्रामीण और 82 फीसदी शहरी आबादी के पास न तो कोई सरकारी स्वास्थ्य स्कीम है और न ही कोई निजी बीमा। इस सूरत में नई बीमा नीति से जनसंख्या का बड़ा हिस्सा सीधे लाभान्वित होगा। इसके अलावा पांच लाख नए स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना, हेल्थ वेलनेस फंड के लिए 1,200 करोड़ की फंडिंग, 24 नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य को मजबूत करने के कदम हैं। इन स्वास्थ्य योजनाओं का असर पूरे देश पर पडे़गा। ये योजनाएं गांवों का नक्शा बदल सकती हैं।  

पिछले तीन वर्षों के दौरान ओलावृष्टि, सूखा और किसानों की आत्महत्या में भारी इजाफे के मद्देनजर 2017-2018 का बजट भले ही किसान व कृषि हित में था, लेकिन योजनाओं के क्रियान्वयन में सुस्ती की वजह से ग्रामीण दुर्दशा ज्यों की त्यों बरकरार रही। इस लिहाज से यह पहला बजट है, जिसमें किसानों को उत्पादों की उचित कीमत देने की ‘सरकारी’ पहल की गई है। पिछले साल इसी सरकार द्वारा सर्वाेच्च न्यायालय में एक हलफनामा दायर कर न्यूनतम समर्थन मूल्य न बढ़ाए जाने की असमर्थता जताई गई थी। नीति आयोग समेत कृषि मंत्री ने भी स्वीकार किया है कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से वंचित रहना पड़ रहा है। इस बजट के बाद यह उम्मीद बनी है कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा। किसानों तक न्यूनमत समर्थन मूल्य का लाभ पहुंचे, इसकी निगरानी का जिम्मा राज्य सरकारों और नीति आयोग को सौंपा गया है।

 

केसी त्यागी, वरिष्ठ जद-यू नेता

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

योगी सरकार के एक साल में किसान ?

Kisan help - 22 March 2018 - 10:35pm

प्रचंड बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार आई जिसने किसानों के लिए जो वादे किये योगी सरकार का एक साल पूरा होने के बाद एक ओर सरकार अपनी उपलब्धियों को गिना रही है व्ही किसान शायद फिर से पिछड़ता हुआ दिखाई दे रहा है हलाकि पूर्व सरकरों के अनुपात में योगी सरकार के कार्य बीस नजर आये लेकिन चुनावी वादों को पूरा करने में सरकार असहज दिखी  
 

चुनाव से पूर्व घोषणा पत्र में किसानों के लिए किय गए वादे 

1.किसानों के लोन और ब्याज होंगे माफ। भविष्य में कर्ज मुक्त ब्याज। 
2. गन्ना किसानों को मिलेगी 6,000 करोड़ रुपये की सहायता। 
3. मुख्यमंत्री कृषि सिंचाई फंड की होगी शुरुआत।
4- सफेद क्रांति के लिए बड़ी डेयरी योजना।
5- मजदूरों को 2 लाख रुपये तक का फ्री बीमा।  
6- पारंपरिक लघु उद्योगों को मिल सकेंगे आसानी से लो।
 
चुनाव से पहले किए गए वादे से अलग सभी किसानों का सारा ऋण माफ नहीं किया गया। छोटे और मझोले किसानों के 1 लाख रुपये तक के ऐसे कर्ज जो मार्च 2016 से पहले लिए गए थे, सरकार ने केवल वही माफ किए, और वादा सुनकर किसानों को मिली खुशी खत्म हो गई।
कर्ज माफ या किसानों से मजाक? 
सारा ऋण माफ न करने को लेकर किसानों के बीच में नाराजगी अभी बनी ही हुई थी कि ऋण माफी के नाम पर 1 पैसे से लेकर कुछ रुपये माफ किए जाने के मामले सामने आने लगे। जारी किए गए डेटा के मुताबिक लगभग 11000 किसानों के 1 से लेकर 500 रुपये के कर्ज माफ किए गए। कई किसान ऐसे थे जिन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि उनके ऊपर कुछ पैसों का कर्ज कैसे था। 
बिजली का जोर का झटका 
कर्ज से राहत न मिलने पर किसानों की हालत पहले से ही कुछ खास नहीं थी कि बिजली दरों में 60 प्रतिशत की वृद्धि कर उनके लिए खेती और मुश्किल हो गई। किसान अभी भी बढ़ी हुई बिजली दरों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। 
सड़क पर आलू, मुश्किल में किसान 
उधर मांग से अधिक आलू की पैदावार के कारण किसानों की मुश्किलें बढ़ने लगी थीं। इसे देखते हुए पहले ही 487 रुपये प्रति क्विंटल में आलू खरीदने की घोषणा कर दी गई लेकिन फिर भी आलू किसानों को होने वाले नुकसान को रोका नहीं जा सका। बाजार में मांग न होने के कारण कोल्ड स्टोरेज में प़डा-पड़ा आलू सड़ने लगा। स्टोरेज से निकालकर बेच पाने में असफल किसानों ने इसी साल जनवरी के महीने में राज्य के कई हिस्सों में बड़ी मात्रा में आलू फेंकना शुरू कर दिया। 
सरकार द्वारा निकाले ये समाधान 
स्थिति की गंभीरता को समझते हुए प्रदेश सरकार ने इस साल दो लाख टन आलू खरीदने का फैसला किया। इसे अलावा सभी राज्यों में आलू के बाजार भाव की तुलना करने के बाद आलू का लाभकारी मूल्य घोषित करने का फैसला भी किया। फूड प्रोसेसिंग विभाग में आलू की खपत बढ़ाने के प्रयास करने की बात भी कही गई। सरकार ने ऐसी मंडियों में आलू भेजने की बात कही जहां इसकी कीमत ज्यादा हो।
डेढ़ गुना एमएसपी अभी एक सुनहरा ख्याब 
हालांकि, केंद्र की बीजेपी सरकार ने 2014 के चुनावों से पहले जो वादा किया था, उसी की उम्मीद राज्य के किसानों राज्य की बीजेपी सरकार से भी लगा रखी है। किसानों की मांग है कि स्वामीनाथन समिति रिपोर्ट की सिफारिशों को मानते हुए किसानों को फसलों पर डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाए। इस बारे में सरकार मूल्यों को बढ़ाने और उचित मूल्य देने की बात तो कहती है लेकिन जिस तरह से केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से साफ कह दिया है कि वह समिति की रिपोर्ट को लागू नहीं कर सकती, राज्य में भी ऐसा होता नहीं दिख रहा है। 

बजट में किसानों पर मेहरबान 
सरकार ने 2018-19 का बजट पेश करते वक्त भी किसानों को रिझाने की कोशिश की। बुंदेलखंड के विकास के लिए 650 करोड़ का इंतज़ाम किया गया है। प्रदेश के सबसे ज्यादा सूखा प्रभावित क्षेत्रों में शामिल बुंदेलखंड में इस वित्त वर्ष में 5 हजार तालाब खुदवाने और 131 करोड़ रुपये सोलर पंप के लिए दिए।
 

बाकी हैं कई चुनौतियां, कई सवाल 
एक साल के अंदर योगी सरकार को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। नीतियों और घोषणाओं के सहारे सरकार ने इन चुनौतियों का सामना करने की कोशिश भले ही की हो लेकिन इनका असर फिलहाल दिखना शुरू नहीं हुआ है। किसान अभी भी बढ़ी हुई बिजली दरें, खेती के प्राइवेटाइजेशन और कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग जैसे मुद्दों पर सरकार से जवाब मांग रहे हैं। कुछ महीने पहले सीतापुर में एक किसान को कर्ज न चुका पाने के कारण ट्रैक्टर से कुचलकर मार दिया गया। किसानों की मौत के बारे में गंभीरता से कदम उठाते हुए सरकार को पिछली सरकार के मुकाबले यह आंकड़े नीचे लाने ही होंगे। 

Tags: किसानबिजलीकर्ज माफकृषि सिंचाईसिंचाईसफेद क्रांतिआलूफसलखेतीखेती किसानी

हम खेती को नौकरियों से अव्वल कब मानेंगे

Kisan help - 21 March 2018 - 10:27am

रूस में अरबपति कारोबारी और नौकरी पेशा भी कर रहे खेती की ओर रुख

यूरोपीय देश ग्रीस के वर्तमान आर्थिक संकट पर पूरी दुनिया में बवाल मचा हुआ है। आखिर क्या वजहें हो सकती हैं, जिससे इस देश की अर्थव्यवस्था चकनाचूर हो गई? मैं कोई पेशेवर अर्थशास्त्री नहीं, ना ही कोई विद्वान, लेकिन आपसी चर्चाओं पर गौर करूं तो कहीं ना कहीं युवाओं में स्वावलंबी होने के लिए नकारापन होना एक बड़ी समस्या के तौर पर देखा जा सकता है। ग्रीस की समस्या एक सांकेतिक इशारा है, दुनिया के अन्य देशों के लिए।

 

हमारी हालिया रूस की यात्रा का उद्देश्य वहां के किसानों को भारतीय उत्पादों और कृषि तकनीक से रू-ब-रू करवाना था। हिन्दुस्तान के गाँवों और जमीनी दूरस्थ इलाकों से जुड़े होने का अनुभव और जुगाड़ तथा टिकाऊ पद्धतियों की खेती की थोड़ी बहुत मेरी समझ को रूस के युवा किसान समझना चाहते थे।

 

रूस में मेरी मुलाकात पेशेवर व्यवसायी और उद्योगपति दिमित्री से हुई। एल्युमिनियम विन्डो प्लेट्स और थर्मल रेसिस्टेंट शीट्स (ताप प्रतिरोधी चादरें) बनाने वाली रूस की सबसे बड़ी कंपनी के मालिक ने पिछले चार वर्षों से अपना रुझान गाँवों की तरफ किया। कुल 120 हेक्टेयर में खेती करने वाले दिमित्री जल्द ही एक बड़ी डेयरी खोलने जा रहे हैं। बिलियन डॉलर कंपनी के मालिक को ट्रैक्टर से जुताई करते देखना और रोज शाम ग्रामीण युवाओं से बातचीत करना, तथा बुजुर्गों से सीख लेते देखना मेरे लिया नया और प्रेरणादायक था।

एयरपोर्ट पर मुझे विदा करने आए दिमित्री से मैंने बड़ी सहजता से पूछ लिया, ”आप, पिछले 20 वर्षों से इतने बड़े अरबपति व्यवसायी हैं और फि र अब अचानक चार वर्षों से खेती के तरफ रूझान क्यों? ये शौकिया या कुछ और? उनका जवाब था, ”अमेरिका टूट जाएगा, अर्थव्यवस्था चूर-चूर हो जाएगी। 1990 के अंतिम दशक में जो दौर रूस ने देखा, अब अमेरिका देखेगा। जब अमेरिका डूबेगा, तो यूरोप और तमाम ऐसे देशों को ले डूबेगा जो डॉलर से मोह बनाए हुए हैं। जो लोग डॉलर के ख्वाब देख रहे हैं, वो एक दिन सुबह सोकर उठेंगे तो पाएंगे कि डॉलर सिवा, कागज़ के कुछ नहीं। डॉलर बुरी तरह से लंगड़ा हो चुका होगा। अमेरिका भारी कर्जे में डूबा हुआ देश है, और दिन-ब-दिन इसकी हालत ज़र्जर हो रही है, इसके परिणाम के लिए बहुत लंबे समय तक इंतजार करने की भी जरूरत नहीं, सिर्फ पांच वर्ष।

 

दिमित्री ने आगे कहा, ”खेती के तरफ रुझान की मेरी सबसे बड़ी यही वजह है। मेरा व्यवसायिक अनुभव कहता है कि जिस देश में खेती प्राथमिकता के तौर पर देखी जाएगी, वो आर्थिक संकट के दौर में भी संभला रहेगा। मैं अपने देश से प्यार करता हूं और खेती करके अपनी भूमि और देश का अहसान ही चुका रहा हूं। मुझे देर से यह बात समझ आई। अपनी समझ अब युवाओं से भी साझा कर रहा हूं। बुजुर्गों के अनुभव का फ़ायेदा ले रहा हूं। शायद हम भविष्य में खुद को संभाल पाएं, मेरे कुछ देशवासियों के लिए अन्न और सब्जियों की व्यवस्था कर पाऊं। युवाओं को इस दिशा में लाने के लिए प्रेरणा बन पाऊं, मैं धन्य हो जाऊंगा। यह मेरा छोटा सा प्रयास है। यूरोप, एशिया और अफ्रीका के क्रास रोड पर ग्रीस बसा हुआ है। ग्रीस के वर्तमान हालात, कहीं कोई डॉलर मोह और फि र उसके परिणाम का संकेत तो नहीं? हालिया घटनाक्रम क्या हमें सचेत होने को नहीं कह रहा? क्या हम खेती को कार्पोरेट की नौकरियों से अव्वल मान सकेंगे या अपनाने की जद्दोजहद करेंगे? आखिर ऐसा क्या है जो हमारे देश का युवा भी पश्चिम की तरफ भाग रहा?दिमित्री जैसे रूस के किसानों से क्या कुछ प्रेरणा ली जा सकती है?

दीपक आचार्य

पराली जलाकर धरती मां का नुकसान न करें : नरेंद्र मोदी

Kisan help - 19 March 2018 - 5:27pm

नरेंद्र मोदी भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, आईएआरआई पूसा परिसर के 'कृषि उन्नति मेला' में शामिल हुए।प्रधानमंत्री मोदी ने किसानों से पराली जलाना छोड़ने की अपील की। उन्होंने कहा कि धरती किसानों की मां है उसे नहीं जलाना चाहिए। यदि वे इसे मशीनों के जरिए हटाएं तो खाद के तौर पर इसका उपयोग बढ़ सकेगा। पराली जलाने से प्रदूषण तो होता ही है। सारे अहम तत्व जलने जमीन की उर्वरता घटती है। प्रधानमंत्री ने इस मौके पर ‘जैविक खेती’ पोर्टल लॉन्च किया। साथ ही देशभर में 25 कृषि विज्ञान केंद्रों की आधारशिला रखी। 

मोदी ने कहा है कि सरकार किसानों के विकास को लेकर प्रतिबद्ध है। किसानों को उन्नत बीज, बिजली से लेकर बाजार तक कोई परेशानी न हो, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के ऐलान का पूरा लाभ किसानों को मिले, इसके लिए हम राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। सरकार फसलों का एमएसपी उनकी उत्पादन लागत का कम से कम 1.5 गुना घोषित करेगी। इसकी गणना के लिए जो लागत जोड़ी जाएगी उसमें खेती के सभी खर्च शामिल किए जाएंगे। इनमें मजदूरी, खुद या किराये पर लिए गए मवेशी/मशीन का खर्च, बीज का मूल्य, सभी तरह की खाद का मूल्य, सिंचाई खर्च, लैंड रेवेन्यू, लीज रेंट समेत अन्य खर्च शामिल हैं। इतना ही नहीं, किसान और उसके परिवार के सदस्यों द्वारा किए गए श्रम के योगदान का मूल्य भी उत्पादन लागत में जोड़ा जाएगा। प्रधानमंत्री मोदी शनिवार को यहां इंडियन एग्रीकल्चर इंस्टीट्यूट (आईएआरआई) पूसा में आयोजित तीन दिवसीय कृषि उन्नति मेले में बोल रहे थे। उन्होंने कहा, इस बजट में जिस ऑपरेशन ग्रीन का ऐलान किया है वह भी नई सप्लाई चेन व्यवस्था से जुड़ा है। इसके तहत सरकार किसान उत्पादक संगठनों, एग्री-लॉजिस्टिक्स, प्रोसेसिंग और पेशेवर मैनेजमेंट को बढ़ावा देगी। 

1)किसानों ने जरूरत के वक्त अनाज पैदा किया

- पीएम मोदी ने कहा, ''हमें याद रखें कि आजादी के बाद जब देश को जरूरत थी तो किसानों ने बेहतर अनाज उत्पादन किया। आज भी रिकॉर्ड पैदावार हो रहा है। आज किसानों के सामने चुनौतियां है, लेकिन हम उनकी आय दोगुनी करने और जीवन सरल बनाने की ओर बढ़ रहे हैं।''

- ''यूरिया की नीम कोटिंग से अनाज उत्पादन बढ़ा है। फसल बीमा में प्रति किसान मिलने वाली राशि दोगुना से ज्यादा की गई है। सालों से बंद पड़ीं सिंचाई योजनाओं को 180 करोड़ के फंड का इस्तेमाल कर आगे बढ़ाया जा रहा है।''

- ''सरकार टीओपी (टोमैटो-ओनियन-पोटैटो) उगाने के लिए किसानों की भरपूर मदद कर रही है। इस बार के बजट में किसानों को फसल की लागत का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) दिलाना तय किया गया है।''

2) कुछ लोग किसानों को गुमराह कर रहे हैं

- ''मैं किसानों को बताना चाहता हूं कि आज कुछ उन्हें गुमराह करने के लिए कई तरह के भ्रम फैला रहे हैं। इसीलिए बता रहा हूं कि अब किसानों को मिलने वाली एमएसपी में उनकी और मजदूरों की मेहनत भी शामिल है।''
- ''सरकार की कोशिश है कि किसानों को फसल बेचने के लिए दूर-दूर ना जाना पड़े। इस बजट में गांवों के हाट को टेक्नोलॉजी से जोड़ने का प्रावधान है। किसान इन हाटों में भी फसल को सीधे बेंच सकता है। वो छोटे-छोटे संगठन बनाकर भी हाटों और अनाज मंडियों से जुड़ सकते हैं।''

3) हम ऑर्गेनिक फॉर्मिंग की मार्केटिंग में पीछे

- ''हम ऑर्गेनिक फॉर्मिंग के दौर में इसकी मार्केटिंग में पीछे रह गए। अब खास तौर से नॉर्थ-ईस्ट को ऑर्गेनिक खेती के लिए विकसित किया जा रहा है। आज हमें ब्लू रेवोल्यूशन, व्हाइट रेवोल्यूशन समेत अन्य क्षेत्रों को भी बढ़ाना होगा। इसके लिए हमने 25 नए कृषि विज्ञान केंद्र शुरू किए हैं। पुराने केंद्रों को भी मॉडर्न बनाया जा रहा है।''
- ''मधुमक्खी पालन कृषि का अहम हिस्सा हो सकता है। महान वैज्ञानिक आइंसटीन ने कहा कि अगर धरती से मधुमक्खियां खत्म हो गईं तो दुनिया नहीं रहेगी। खेती के साथ मधुमक्खी पालकर किसान दो से ढाई लाख की अतिरिक्त आय बढ़ा सकते हैं। मक्खियां फसलों के उत्पादन को बढ़ाने में भी मदद करती हैं।''

4) पराली जलाकर धरती मां का नुकसान न करें
- ''आय बढ़ाने के लिए किसान खेतों की मेढ़ पर सोलर पैनल लगाकर पंप चलाने के लिए बिजली पैदा कर सकते हैं। अगर जरूरत से ज्यादा बिजली पैदा हो जाए तो इसे सरकार को भी बेचा जा सकता है। बॉयो वेस्ट के सही इस्तेमाल के लिए सरकार ने गोबरधन योजना शुरू की है। किसान बॉयोगैस प्लांट बनवाएं और इससे ईंधन का उत्पादन करें।''

- ''देश में आज एक गलत परंपरा शुरू हो गई है, पराली जलाने की। साथियों हम धरती मां को परेशान कर रहे हैं। जब हम इसे जलाते हैं तो वो धरती की पैदावर क्षमता खत्म होने लगती है। अगर हम पराली को खेत में मिला दें तो धरती की पैदावर क्षमता बढ़ेगी। किसान भाइयों से अपील करता हूं कि वो पराली जलाकर धरती मां को नुकसान नहीं करें।''

5) इंसाल के अलावा चीटियां भी करती हैं खेती

 ''इस कृषि मेला में किसान भाइयों ने जो भी नई टेक्नोलॉजी देखी है, उसे खेती में अपनाने की कोशिश करें। मैं चाहता हूं कि ऐसे मेलों को देश के दूर-दराज के इलाकों में भी कराना चाहिए। इस बात की स्टडी होनी चाहिए कि किसानों पर मेले का कितना असर हुआ। उन्हें क्या फायदा मिला? क्या नई टेक्नोलॉजी देखने को मिली, कैसे उनका जीवन सरल होगा?''
- ''दोस्तों मैंने कहीं पढ़ा है कि इंसान के अलावा चीटियां भी खेती करती हैं। दुनिया के कुछ जंगलों में वो खेत बनाती हैं, पानी की व्यवस्था करती हैं। फंगस और एंटीबायोटिक पैदा करती हैं। सालों से इसी काम में लगी हुई हैं।''

दैनिक भास्कर 

Tags: कृषिकृषि मेलाकिसानखेतीयूरिया

आज़ाद देश में बेबस अन्नदाता

Kisan help - 18 March 2018 - 7:34pm

भारत एक कृषि प्रधान देश है , किसान अन्नदाता है,देश की अर्थव्यवस्था में 70%कृषि का योगदान है सदियों से हम लोग कुछ जुमलो को दोहराते रहे है । निःसंदेह भारत की पिछले हजार दो हजार साल की अर्थ व्यवस्था कृषि पर आधारित रही है हांलाकि यह इस अर्थ में सही है कि अधिकांश लोग कृषि कार्य करते थे, और कृषि कार्य के आधार पर ही अपनी जीविका चलाते थे।
पंचवर्षीय योजनाओं में नदियों के पानी के इस्तेमाल के लिये नहरों आदि की योजनाये बनाई और कुछ का निर्माण भी हुआ जैसे भाखड़ा नंगल डेम, और उससे पानी को खेतो में दिये जाने वाली नहरें बनी जिससे पंजाब और हरियाणा के खेतों को पानी मिला। इन राज्यों के राजनैतिक नेतृत्व ने भी बांध और नहरों के निर्माण में अहम् भूमिका निभाई तथा इन राज्यों को हरित क्रांति के माध्यम से सम्पन्न किसान केे रुप में खड़ा किया। परन्तु यह प्रयोग भी कुछ राज्यो तक ही सीमित रहे।
1965 में जब डा.लोहिया चुनकर संसद में पहुंचे तो उन्होंने देश को और संसद के माध्यम से सरकार को बाढ़ और सूखे के खतरो के प्रति सावधान किया। उन्होंने कहा कि एक तरफ देश के करोड़ों लेाग बाढ़ से। अगर बरबाद हो जाते है और दूसरी तरफ करोड़ो लेाग सूखे से। अगर बाढ़ के पानी को बांधकर सूखे खेत की और मोड़ दिया जाये तो देश को सूखे और बाढ़ की भीषण यातनाओं से स्थाई मुक्ति मिलेगी तथा कृषि की आय बढ़ेगी और गांव में सम्पन्नता तथा स्व विकास की क्षमता पैदा होगी। परन्तु तत्कालीन सरकार ने राजनैतिक विरोध की वजह से लेाहिया की इस बात को स्वीकार नही किया और आज लोहिया के उस भाषण के 68 वर्ष बाद भी देश इन बाढ़ और सूखे की विभीषकॉओं को झेलने के लिये अभिशप्त है। पिछले वर्षो में कृषि के समक्ष जो संकट पैदा हुये है उन्हें हम निम्न प्रकार से जान सकते है।
1 सूखा, 2 बाढ़,  3 कृषि उत्पादन की बढ़ती लागत,

4 हरितक्रांति याने विकसित बीज और बढ़ता लागत खर्च, 5 किसान पर कर्ज और बढ़ती आत्महत्याएं,  

6 कृषि के रकवे में कमी और  7 विकास के नाम पर जमीन अधिग्रहण।

पिछले 3-4 दशकों में जो घटनायें घटी है उनका बारीकी से विष्लेषण किया जाये तो एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि आजादी के बाद की भारत सरकार ने विकास का आधार गांधी की कल्पना के विपरीत याने गॉव व कृषि के विपरीत उद्योग और शहरों को बनाया तथा भारी उद्योगो के माध्यम से भारी पूंजी के इस्तेमाल से शहरों के विकास की कल्पना की थी। इन भारी उद्योगों के लिये हजारो एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया था। इनकी प्यास बुझाने पर खेतो के हकका पानी लगामा गया। ग्रामीण पंूजी को शहरो के विकास पर लगाया। इसके परिणाम स्वरुप जहॉ कृषि क्षेत्र घटा कृषि उपेक्षित हुई-कृषि क्षेत्र में पूंजी निवेश नही हुआ-वही कर्मचारियों की एक संगठित जमात खड़ी हुई जो बहुत हद तक केवल अपने आप में केन्द्रित हो गई।
राष्ट्रीय सरोकारो या राष्ट्रीय चिंताओं के सहभागी बनने के बजाय यह जमात अपने मंहगाई भत्ते तक सिकुड़ गई इसके परिणाम स्वरुप खाद्यान्न की पूर्ति के लिये भी विदेशी आयात मुख्य साधन बन गया। 70 के दशक से सरकारों ने हरित क्रांति की पहल की और  के आधार पत्र के रुप में विदेशी बीज (हाई ब्रीड सीड) विदेशी खाद, विदेशी दवाये रसायनिक खाद आदि का चलन तेज किया। इनके प्रयोग से पैदावार तेजगति से बढ़ी। इससे राष्ट्रीय उत्पादन बढ़ा। परन्तु कुछ विपरीत प्रभाव भी सामने आये। खेती की जमीन जो देशी गोबर खाद या जैविक खाद से अपनी गुणवत्ता बनाके रखती थी वह रसायनिक खाद में जल गई तथा उपजाऊ मिट्टी रेतीली मिट्टी में बदल गई। और जमीन की स्व उर्वरकता लगभग समाप्त कर दी गई। पानी का प्रयोग कई गुना बढ़ गया और धीरे-धीरे जल संकट और गहराने लगा।
जिन इलाको में हाई ब्रीड सीड से उत्पादन एकदम तेज हुआ तथा किसानो की आमदनी बढ़ी तो उन्होंने कार, टैक्टर आदि के इस्तेमाल और सुख सुविधाओं को अपना लिया और जब किसी एक वर्ष में बीज की खराबी, वर्षा-अभाव या अन्य किसी कारण से पैदावार नही हुई तो वह आधात सहना किसानो को कठिन हो गया। एक तरफ लागत में भारी वृद्धि दूसरी तरफ भारी घाटा और तीसरी तरफ मंहगी और विलासी जीवन शैली और चौथी तरफ सदमा सहने के साहस की कमी ने किसानो को आत्महत्या का रास्ता दिखा दिया।
अनेक अध्यनों के आधार पर और सरकारी सूचनाओं के आधार पर यह जानकारी सामने आई है कि पिछले एक दशक में कई लाख किसान आत्महत्या कर चुके है। पिछले 65 वर्षो में सूखा राहत और बाढ़ राहत के नाम पर लाखों करोड़ो रुपये खर्च किये गये जिसका अधिकांश नेताओं व अफसरो के पेट में चला गया परन्तु स्थिति बद से बदतर हो गई। अगर यह राषि सूखे और बाढ़ से मुक्ति याने बाढ़ के पानी और सूखे खेत के रिष्ते जोड़ने में खर्च किये होते तो यह स्थिति नही बनती।
सरकारो ने आम तौर पर बैंको से किसानों को कम ब्याज पर और किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से आसानी से कर्ज की व्यवस्था की परन्तु इस कर्ज का हाल या तो कृषि इतर कार्यो में हुआ या फिर वह कोई स्थाई हल नही दे सका। तथा किसान फिर से बैंक के साथ साथ निजी साहूकारो की तरफ मुड़ गया। निजी साहूकारो की ब्याज की दरे कितनी भारी होती है और बसूली कितनी कठोर होती है यह किसी से छिपा हुआ नही है परिणाम स्वरुप किसानों की आत्महत्यायों की घटनायें हुई है। उनको अगर बारीकी से देखा जाये तो बहुतायत उनकी है जो सरकारी कर्ज के अलावा निजी साहूकारो के कर्ज से परेशान है।
बदलते दौर में एक और नये प्रकार की प्रवृति सामने आई है। अब किसान जो थोड़ा बहुत सक्षम है या फिर जिसके पास खेती के अलावा कोई व्यापार या नौकरी आदि का सहारा है वह जमीन का मालिक तो है परन्तु खेती नही करता। और अपनी जमीन को कृषि के लिये बटाई (आधे-आधे) या फिर ठेका पर देकर कृषि कराने छोटे किसानो या मजदूरो को देता है। और अगर कोई प्राकृतिक विपत्ती आई तथा सरकार ने मुआवजा भी दिया तो मुआवजा की राषि जमीन के मालिक के पास पहॅुचती है तथा बटाईदार या ठेका खेतीवाला जो लागत लगा चुका है पैसा दे चुका होता है पूर्णतः बरबाद हो जाता है।
कहीं-कहीं कोई ईमानदार जमीन का मालिक ऐसा होता है जो इस मुआवजे की रकम को पीड़ित किसान को दे देता है। इस घटनाओं से अब ग्रामीण क्षेत्रो में भुखमरी के हालात पैदा हो गये है। कि जिसे देश के लोग व बुद्विजीवी गौरव से अन्नदाता कहते है और कभी-कभी खुद किसान अपने आप को अन्नदाता मानकर गौरवन्वित होता है अब ऐसे मुकाम पर पहॅुच रहा है जिसे अपना ही पेट भरना मुष्किल हो रहा है।
पिछले दिनो महाराष्ट्र की दो घटनायें सामने आई। एक यह कि एक फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर ने अपनी तरफ से कुछ किसानो को आर्थिक सहायता देना शुरु किया ताकि वे आत्महत्या को लाचार न हो और दूसरी यह कि भास्कर की पहल पर अन्नदाताओं को पेट भरने के लिये जनता से अन्न इक्ट्ठा कर शहरो से इक्टठा कर उसे गांव में अनाज उत्पादकों में बॉटा जायेगा।
57 टन अनाज विदर्भ के सूखा पीड़ित अंचलो में सहायता और पेट भरने के लिये बाटा जायेगा। निःसंदेह यह दोनो मानवीय पहल है और नाना पाटेकर तथा भास्कर या अन्य कोई भी व्यक्ति, संस्थाये जो इसकी पहल कर रही है वह बधाई की पात्र है। परन्तु गम्भीर और यक्ष प्रश्न यह है कि आज अन्नदाता अन्न ग्रहीता बन गया है जो स्वतः पर निर्भर हो कर पेट भरने को भी दूसरो पर निर्भर है। तो अब क्या किसान को अन्नदाता कहा जाये? यह कितनी विचित्र त्रासदी है कि जहॉ खेत खलिहान है वहां अनाज नही है और जहॉ बाजार और गोदाम है वहा अनाज है। यह भी एक गम्भीर बदलाव का संकेत है कि उत्पादन उत्पादक के पास नही बल्कि बाजार और सम्पन्न लोगो के पास है। अगर किसानों ने भी इन सवालों पर सोचना व उत्तर व हल खोजना शुरु नही किया तो यह दोनो जुमले-जुमले भी नही रहेगे। देश कृषि प्रधान के बजाय अनाज आयातक यानी आयात प्रधान और किसान अन्नदाता के बजाय अन्न भिक्षुक बन जायेगा। 

kisanhelp परिवार नें दी नव वर्ष की शुभकामनाएं

Kisan help - 18 March 2018 - 7:37am

kisanhelp परिवार नें  सभी देश वासियों  को हिन्दू नववर्ष की हार्दिक शुभकामना दी है. उन्होंने कामना की है कि नव वर्ष सभी देश वासियों के लिये मंगलमय हो. देश में शांति सौहार्द और भाईचारे का वातावरण रहे.साथ ही ईश्वर से यह कामना कि यह वर्ष 2017 किसान भाइयों के लिए उन्नति एवं सम्पन्नता लाएचैत्र प्रतिपदा से हिन्दू नववर्ष के प्रारंभ के साथ ही बड़े नवरात्र शुरू होते हैं। ये नौ दिन माता की आराधना के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
श्री सिंह ने अपने हिन्दू नववर्ष के सन्देश में कहा   

नए साल की पावन बेला में एक नई सोच की ओर कदम बढ़ाएँ
हौसलों से अपने सपनों की ऊंचाइयों को छू कर दिखाएँ
जो आज तक सिमट कर रह गई थी ख्यालों में..,
उन सपनों को भारतीय नव वर्ष 2018 में सच कर दिखाएँ………!!!!!!

सर्वे   भवन्तु   सुखिन:   सर्वे   सन्तु निरामया:।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:ख भाग्भवेत्॥

सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी को शुभ दर्शन हों और कोई दु:ख से ग्रसित न हो. मैं नव-वर्ष में सभी के लिये यही शुभकामना करता हूँ ।

Tags: हिन्दू नववर्षनववर्ष

कृषि प्रधान देश में किसान क्यों है बेहाल ?

Kisan help - 16 March 2018 - 11:26pm

एक साल पहले फरवरी मार्च के दिनों में देश की राजधानी दिल्ली में तमिलनाडु के बदहाल किसान पहुंचे थे. उनके प्रतिरोध को हथकंडा, नाटक और फोटोशूट की संज्ञा देने वालों की कोई कमी नहीं थी. डॉयचे वेले में प्रकाशित एक आलेख में बताया गया था कि 2004-05 और 2007-08 में कृषि सेक्टर की सालाना औसत वृद्धि दर पांच फीसदी थी I  लेकिन 2008-09 और 2013-14  में ये गिर कर तीन फीसदी रह गई. इन्हीं अवधियों में अर्थव्यवस्था में क्रमशः नौ और सात फीसदी की सालाना औसत वृद्धि दर्ज की गी. कृषि की बदहाली का ठीकरा खराब मौसम की स्थितियों पर फोड़ा गया है I  

सिंचाई के उन्नत साधन, जल प्रबंधन, आदिवासियों को वनभूमि का आवंटन, कृषि बीमा, कृषि बाजार, फसल का बेहतर मूल्य, गांवों मे सड़क और बिजली आदि की समुचित व्यवस्था, पशुधन की देखरेख, कृषि तकनीक का विकास, बेहतर उर्वरक और ऋण सुविधा और अदायगी की आसान शर्तें- ये सब बातें एक प्रभावी और न्यायपूर्ण नीति के लिए जरूरी हैं. स्वामीनाथन कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कमोबेश ये सारी बातें रखी हैं और अब तो केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि जल्द से जल्द उसकी सिफारिशों को लागू करेI

 किसान हैल्प के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. आर. के. सिंह जी कहते हैं " कि किसानों की मांग पूरी तरह से बाजिव हैं ।किसानों की आजादी से लेकर आज तक अनदेखी की गई है लेकिन अब किसान अपने हक की लड़ाई लड़ने के लायक हो चुका है और किसान वर्ग को भी अपना हक चाहिय । बल्कि मेरा मानना है कि आज के हालात और किसानों को बचाना है तो स्वमीनाथन आयोग की सिफारिश भी आयोग्य है क्योंकि उस आयोग की सिफारिशों में भी किसानों को अपने उत्पादों का मूल्य तय करने का अधिकार नहीं है।आज हम किसनों को उद्योग का दर्जा चाहिये।"

 

खैर किसान कब तक धरना प्रदर्शन करते रहेंगे और कब तक मजबूरी में अपनी जानें गंवाते रहेंगे. आत्महत्या के आंकड़े भी सबसे ज्यादा उसी महाराष्ट्र से हैं जहां आज किसान लामबंद होकर देश की कमर्शियल कैपीटल पर अपनी छाप छोड़ने पहुंचे हैं I 

राजस्थान में बीकानेर जिले में 1.00.000 किसानों को इकठ्ठा होकर आन्दोलन की हवा देना I मध्य प्रदेश में सव्जियों .दूध को रोड पर फैलाना यह सभी पिछले कुछ वर्षों में अचानक ही बाद गया है 

मध्यप्रदेश किसान सभा के अध्यक्ष जसविंदर सिंह ने बताया कि किसानों को उनके उत्पाद का वाजिब दाम नहीं मिल रहा है. जितना पैसा वे अपनी फसल उगाने में लगा रहे हैं, उतना उन्हें उसे बेचने में नहीं मिल रहा है. इससे किसान की हालत बहुत खराब हो गई है और वे कर्ज के तले दबे हुए हैंI 

राजस्थान के बीकानेर जिले के किसान एवं किसान हैल्प के जिला प्रतिनिधि आसुराम गोदारा बताते हैं कि सरकार किसानों को जानबूझ कर पीछे ढकेल कर कर्पोर्रेट के लिय तयारी कर रही है I ऐसा अभी से नही आजादी के बाद ही यह सिलसिला शुरू हो गया था I

 

सबका साथ-सबका विकास में किसान शामिल क्यों नहीं ?

Kisan help - 13 March 2018 - 6:36pm

भाजपा सरकार का कहना है कि वो किसानों के मुद्दों को लेकर संजीदा हैं. बीते साल कई जनसभाओं में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भाजपा सरकार 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने का संकल्प रखती है और इसी दिशा में आगे बढ़ रही है.

प्रधानमंत्री का कहना था कि किसानों की बेहतरी के लिए कृषि उत्पादों की मूल्य वृद्धि के लिए उन्होंने किसान संपदा योजना की घोषणा की है जो "सच्चे अर्थ में देश की अर्थव्यवस्था को एक नया आयाम देगा."

इधर इसी सप्ताह राजस्थान में क़र्ज़ माफ़ी को लेकर जयपुर में पड़ाव डालने निकले किसान संगठनों और प्रदेश की भाजपा सरकार में ठन गई है. पुलिस ने किसान संगठन के मुख्य नेताओं को हिरासत में ले लिया है.

गांव देहात से निकले इन किसान संगठनों की मांग है कि सरकार ने कर्ज़ माफ़ी का जो वादा किया था उसका पालन नहीं किया है. पांच महीने पहले भी इन्हीं किसान संगठनों ने राज्य में प्रदर्शन किया था और राज्य में कमकाज लगभग ठप कर दिया था.

राष्ट्रीय किसान महासंघ और दूसरे संगठनों से जुड़े किसानों ने इसी सप्ताह दिल्ली घेराव का एलान किया था. ये संगठन समर्थन मूल्य और ऋण माफ़ी की मांग उठा रहे हैं.

किसानों के साथ अन्याय हो रहा है

सरकार का कहना है कि वो किसान की आय दोगुनी करेगी, लेकिन पहले तो हम ये जानने की कोशिश करें कि आज किसान की आय क्या है.

1990 के आसपास से ये कृषि संकट बढ़ता जा रहा है. 2016 का जो सरकार आर्थिक सर्वे है उसके अनुसार 17 राज्यों में किसानों की सालाना आय औसत बीस हज़ार रुपए है. इस हिसाब से किसान हर महीने क़रीब 1,700 से 1,800 रुपए में अपने परिवार को पाल रहा है.

'देश में किसान और किसानी की हत्या हो रही है'

 

क्यों मुश्किल में हैं किसान?

किसानों को काफ़ी हद तक ये समझ भी नहीं आता कि उसे जो मार पड़ रही है वो क्यों पड़ रही है. उसे पता है कि है कि उसके साथ अन्याय हो रहा है. अगर किसान अपना काम भी कराने जाता है तो सरकारी दफ्तरों में एड़ियां रगड़ने के बाद भी काम नहीं होते.

खाद लेने में मुश्किल, कीटनाशक लेने में दिक्क़त- ये इसीलिए है क्योंकि किसानों के लिए बनाई गई सारी व्यवस्थाएं ही सड़-गल चुकी हैं. उसे ठीक करने की ज़िम्मेदारी कोई नहीं ले रहा है. ये सब चीज़ें किसान के ग़ुस्से को बढ़ावा देती हैं या उसे बढ़ाती हैं.

लेकिन मूल संकट ये है कि किसान को समझ नहीं आ रहा है कि जब उसकी पैदावार अच्छी होती है और वो बाज़ार में अपना सामान लेकर आता है तो अचानक दाम क्यों गिर जाते हैं. बाज़ार में उचित दाम न मिलने पर उसे टमाटर, आलू और अपनी अन्य फसल सड़कों पर फेंकनी पड़ती है.

ये भी देखा गया है कि जहां गेहूं और धान जैसे उत्पादों पर सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य देती है वहां भी सड़क पर फेंकना पड़ता है.

किसान को जान-बूझ कर ग़रीब बनाया गया है

मैंने एक अध्ययन किया है जिसके अनुसार 1970 में गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 76 रुपये प्रति क्विंटल था. 2015 में वो बढ़ कर 1450 रुपये प्रति क्विंटल है. आज वो 1735 रुपये प्रति क्विंटल है. यदि 1970 से 2015 तक का वक़्त आप देखें तो आपका पता चलेगा कि इसमें 20 गुना बढ़ोतरी हुई है.

सरकारी मुलाज़िम की सैलरी और डीए देखा तो मैंने पाया कि 1970 से 2015 तक में उनकी आय में 120 से 150 गुना बढ़ोतरी हुई है. इसी दौरान कॉलेज और यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसरों की आय 150 से 170 गुना बढ़ी है. कंपनी के मध्यम स्तर के नौकरीपेशा लोगों की आय 3000 गुना बढ़ी है.

किसानों के लिए क्यों नहीं है कोईआय कमीशन?

ये अच्छी बात है कि आज देश में किसानों के मुद्दों पर चर्चा तो हो रही है. प्रधानमंत्री ने जब कहा कि वो किसानों की आय को दोगुना करेंगे उन्होंने संकेत दिया कि वो किसान की आय से संबंधित मुद्दों पर ध्यान देना चाहते हैं.

इससे पता चलता है कि इस बात की समझ अब बन रही है कि किसानों की आय के मुद्दों को सुलझाना बेहद ज़रूरी है और आय कम होने के कारण उत्पादन कम होना नहीं बल्कि पैसे कम होना है.

सरकारी मुलाज़िमों के लिए पे कमीशन की बात होती है तो किसान के लिए भी किसी ऐसे कमीशन की बात की जानी चाहिए जो उसकी आय को निर्धारित कर सके.

न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने वाले कमीशन से अलग या फिर इसी कमीशन के साथ एक अन्य कमीशन बनाया जाए जो ये सुनिश्चित करे कि किसानों को कैसे महीने में 18 हज़ार रुपए मिल सकेंगे.

अगर ऐसा किया जा सका तो हम सही मायनों में कह सकेंगे कि 'सबका साथ-सबका विकास' में किसान भी शामिल हैं. मेरा मानना है कि जिस दिन साठ करोड़ किसानो के हाथ में पैसा होगा ये जीडीपी के आंकड़ों की लड़ाई ख़त्म हो जाएगा और सीधे 20 फीसदी बढ़ जाएगी.

सरकार वाकई मदद करना चाहे तो उसे 2022 तक इंतज़ार नहीं करना चाहिए, उसे आज से ही काम करना शुरू करना चाहिए.

बीबीसी हिन्दी

 

किसानों के प्रदर्शन का वास्तविक कारण क्या है ?

Kisan help - 13 March 2018 - 8:10am

देश की सरकार आज फिर तमाशा वीन बन कर किसानों के आंदोलन का आनन्द लेती नजर आ रही है । मुंबई के आज़ाद मैदान में 30000 आदिवासी किसान 180 किलोमीटर तक पैदल मार्च करते हुए पहुँच गए हैं। ये किसान इस प्रदर्शन के ज़रिए इन मांगों को मनवाने की कोशिश कर रहे हैं।
किसानों द्वारा प्रमुख माँग
वन अधिकार कानून , 2006 सही ढंग से लागू हो
स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों को लागू किया जाए
सरकार कर्ज़ माफ़ी के वादे को पूरी तरह से लागू क रे
लेकिन सवाल ये है कि इन मांगों का सही-सही मतलब क्या है?

वन अधिकार क़ानून, 2006
मुंबई पहुंचे किसानों के इस हुजूम में एक बड़ी संख्या आदिवासी किसानों की है.
शेतकरी संगठन से जुड़े किसान अश्टेकर कहते हैं, "दरअसल ये एक आदिवासियों का मोर्चा है, जो जंगल-जमीन पर अपने हक के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं."

ये किसान साल 2006 में पास हुए वन अधिकार कानून को ठीक ढंग से लागू किए जाने की मांग कर रहे हैं.

दरअसल, वन अधिकार कानून आदिवासी किसानों को जंगल से पैदा होने वाले उत्पादों के सहारे जीविका कमाने का अधिकार देता है.

हालांकि दावा किया जाता है कि महाराष्ट्र के ही दूसरे इलाके गढ़चिरौली में इस कानून को बेहतर ढंग से लागू किया गया है. लेकिन नासिक में ऐसी स्थिति नहीं है.

वन अधिकारियों द्वारा कई बार किसानों के खेत खोद दिए जाते हैं ।वो जब चाहें तब ऐसा कर सकते हैं। किसानों के अनुसार उन्हें अपनी ज़मीन पर अपना हक़ चहिए। किसानों का कहना है कि हमें हमेशा दूसरे की दया पर जीना पड़ता है."
'कर्ज़ माफ़ी हो और हर तरह से हो'
आदिवासी क्षेत्र में काम करने वाले समाजसेवी ध्रुव मनकड बताते हैं कि "महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में वन अधिकार कानून ठीक ढंग से लागू किया गया है लेकिन नासिक में अब तक ऐसा नहीं हुआ है. क्योंकि गढ़चिरौली और नासिक के हालात में अंतर है."

"गढ़चिरौली में प्राकृतिक वन क्षेत्र नासिक की अपेक्षा ज़्यादा है और वहां के किसान सामुदायिक अधिकार के मॉडल पर काम कर सकते हैं. लेकिन नासिक में स्थिति अलग है. नासिक में प्राकृतिक वन क्षेत्र काफ़ी कम है. इस वजह से किसान सामुदायिक अधिकारों की जगह व्यक्तिगत अधिकारों की मांग कर रहे हैं."
किसान हैल्प के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ आर के सिंह जी ने कहा "कि देश की वर्तमान सरकार एवं पूर्व की सरकारों ने पक्षपात रवैया शुरू से ही किसानों के साथ रखा है।अन्य उत्पादन की इकाइयों की तरह हमें भी मूल्य निर्धारण का अधिकार चाहिये।"
उन्होंने साथ ही देश के सभी बड़े एवं छोटे किसान संगठनों से अपील की कि अब इकठ्ठा होकर हमें अपने अधिकारों को छीनना होगा।स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू होने पर भी हमें मूल्य निर्धारण अधिकार नहीं मिलेगा।मूल्यनिर्धारण अधिकार सिर्फ उधोग का दर्जा मिलने के बाद ही मिलेगा आज हमारी जरूरत है कि खेती को उद्योग का दर्जा मिले।"

मार्च कर रहे किसानों की दूसरी सबसे बड़ी मांग ये है कि महाराष्ट्र सरकार कर्ज़ माफ़ी के अपने वादे को पूरा करे.

"कर्ज़ माफ़ी के संबंध में जो आंकड़े दिए गए हैं वो बढ़ा-चढ़ा कर बताए गए हैं. जिला स्तर पर बैंक खस्ताहाल हैं और इस कारण कर्ज़ माफ़ी का काम अधूरा रह गया है. इस तरह की स्थिति में बैंकों को जितने किसानों को लोन देना चाहिए उसका दस फ़ीसद भी अभी नहीं हो पाया है."

Tags: किसानकिसानहेल्पkisan

पूर्ण कर्जमाफी समेत कई मांगों को लेकर करीब 30 हजार किसान पैदल मार्च

Kisan help - 12 March 2018 - 4:09pm

पूर्ण कर्जमाफी समेत कई मांगों को लेकर करीब 30 हजार किसान पैदल मार्च करते हुए सोमवार को नासिक से मुंबई पहुंचे। इस मोर्चे (लॉन्ग मार्च) की अगुआई सीपीएम का किसान संगठन अखिल भारतीय किसान सभा कर रही है। किसानों के प्रतिनिधि मंडल और मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस के बीच मुलाकात जारी है। अगर ये मीटिंग नाकाम रहती है तो किसान विधानसभा का घेराव करेंगे। किसानों के समर्थन में सत्तारूढ़ शिवसेना और राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) आ गई है। देर रात किसानों से मिलने पहुंचे राज ठाकरे ने कहा, "उन्हें को जब भी मेरी जरूरत होगी, मैं हाजिर हो जाऊंगा।" कांग्रेस ने पहले ही इस मोर्चे को समर्थन दे दिया है।

राहुल बोले- ये देशभर के किसानों का मामला

- राहुल ने कहा, "ये मामला केवल महाराष्ट्र के किसानों का नहीं है बल्कि पूरे देश के किसानों का है।"

एहतियातन उठाए गए कदम

- किसान मोर्चे के कारण सोमवार को सुबह 9 बजे से रात 11 बजे तक ईस्टर्न एक्सप्रेस-वे पर बड़े वाहनों को बैन कर दिया गया है।

- छोटे वाहनों के लिए एक तरफ का रास्ता (वन वे) चालू रहेगा, लेकिन 20 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से ही वाहन चलाने की परमिशन है।

- किसानों के रुख को देखते हुए विधानसभा के बाहर भारी संख्या में पुलिसबल रविवार देर रात से ही तैनात किया गया है। वहीं क्विक रिस्पांस टीम और फायर ब्रिगेड को भी अलर्ट किया गया है।

- आजाद मैदान में जुटे किसानों के लिए बीएमसी ने व्यवस्थाएं की हैं। यहां अस्थाई रूप से 40 से ज्यादा मोबाइल टॉयलेट लगाए गए। पीने के पानी का भी इंतजाम किया गया है।

कई पार्टियों ने किसानों का समर्थन किया

- राज ठाकरे ने बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पर भी हमला बोला। ठाकरे ने इस दौरान सवाल उठाते हुए कहा कि किसानों की कर्जमाफी के शाह के वादे का क्या हुआ।

- इससे पहले रविवार को शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे ने किसानों से मुलाकात के दौरान उन्हें कर्ज से मुक्ति दिलाने की मांग की। उन्होंने कहा, ''हम कर्ज माफी नहीं चाहते। माफी किसी मामले के दोषी को दी जाती है। हम दोषी नहीं हैं। हम कर्ज से मुक्ति चाहते हैं।"

- वहीं फड़णवीस सरकार में मंत्री और शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे ने आनंद नगर में किसानों से मुलाकात की। उन्होंने बताया कि उद्धव ठाकरे ने इस संबंध में मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस से मुलाकात की।

- महाराष्ट्र कांग्रेस ने भी किसानों का समर्थन किया है। कांग्रेस नेता अशोक चव्हाण ने ट्वीट कर किसानों की फोटो शेयर की और उन्हें कांग्रेस पार्टी के समर्थन की बात कही। उन्होंने लिखा, ''सरकार के खिलाफ किसानों के इस संघर्ष में कांग्रेस पार्टी उनके साथ है। मुख्यमंत्री को किसानों से बात करनी चाहिए और उनकी मांगों को स्वीकार करना चाहिए।''

सरकार ने बनाई कमेटी
- किसानों के रुख को देखते हुए महाराष्ट्र सरकार भी एक्शन में आ गई है। किसानों की मांगों पर विचार करने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने एक कमेटी गठित की है, जिसमें छह मंत्री शामिल हैं। इन मंत्रियों के नाम हैं- चंद्रकांत पाटिल, पांडुरंग फुंडकर, गिरीश महाजन, विष्णु सवारा, सुभाष देशमुख और एकनाथ शिंदे।

- रविवार को महाराष्ट्र के मंत्री गिरीश महाजन ने किसानों से जाकर मुलाकात की थी। उस दौरान उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस किसानों के साथ हैं। किसानों की 90% मांगें पूरी की जाएंगी। सोमवार को विधि मंडल में सभी मुद्दों को उठाया जाएगा। सरकार किसानों के साथ है।

कई किसानों की तबियत हुई खराब
- किसानों की यह रैली 6 मार्च को नासिक से शुरू हुई। रात वासिंद में रुकी और शनिवार को ये लोग ठाणे पहुंचे। 
- किसान हर दिन 30 किलोमीटर चलते हुए तकरीबन 180 किलोमीटर का सफर पूरा कर सोमवार तड़के मुंबई के आजाद मैदान पहुंचे।
- शनिवार को यात्रा में शामिल 5 किसानों की तबीयत बिगड़ गई थी, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इलाज के बाद किसानों को छुट्टी दे दी गई है। इन किसानों को पानी की कमी और कम ब्लड प्रेशर की शिकायत के बाद अस्पताल ले जाया गया था।

क्या है किसानों की मांगें?

- किसानों के नेता और एआईकेएस सचिव राजू देसले के मुताबिक, "किसानों ने पूरे कर्ज और बिजली बिल माफी के अलावा स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने की मांग रखी है। बीजेपी सरकार ने किसानों से किए गए वादों को पूरा न करके उनके साथ धोखा किया है।"

- "हम यह भी चाहते हैं कि सरकार विकास, हाईवे और बुलेट ट्रेन के नाम पर जबर्दस्ती किसानों की जमीन छीनना बंद कर दे।" 
- "पिछले साल राज्य की बीजेपी सरकार ने सशर्त किसानों का 34 हजार करोड़ रुपए का कर्ज माफी करने का एलान किया था। इसके बाद जून से अब तक 1753 किसानों ने खुदकुशी कर ली है।"

- फसलों के सही दाम न मिलने से भी किसान नाराज है। सरकार ने हाल के बजट में भी किसानों को एमएसपी का तोहफा दिया था, लेकिन कुछ संगठनों का मानना था कि केंद्र सरकार की एमएसपी की योजना महज दिखावा है।

सरकार ने किसानों के लिए खोला खजाना

- राज्य में खेती की हालत खराब हो रही है। किसानों में नाराजगी बढ़ रही है। इसे देखते हुए फडणवीस सरकार ने इस बार के बजट में किसानों के लिए 75 हजार 909 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है।

शहरवासियों ने किया स्वागत

- अखिल भारतीय किसान सभा की तरफ से निकाले गए मोर्चे के मुंबई पहुंचते ही मुंबईवासियों ने किसानों का दिल खोलकर स्वागत किया। मुंबई के ईस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे पर ठाणे से सायन तक के बीच में जगह-जगह पर नागरिकों ने किसानों का फूल देकर स्वागत किया। किसानों के लिए पानी, चाय और नाश्ता की व्यवस्था भी की।

साभार दैनिक भास्कर

Tags: कर्जमाफीसरकारमहाराष्ट्र

कृषि और किसानों की मुस्कुराहट का आएगा नया दौर

Kisan help - 6 March 2018 - 2:47pm

निःसन्देह वर्ष 2017 कृषि संकट का वर्ष रहा। देश के कई राज्यों में मौसम की मार से जूझते किसानों ने लाभकारी मूल्य पाने के लिये आन्दोलन किए, वहीं उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश आदि राज्यों ने किसानों के हजारों करोड़ रुपए के ऋण माफ किए। बीते वर्ष किसानों को मिली निराशाओं और चिन्ताओं को ध्यान में रखते हुए नए वर्ष 2018 में केन्द्र सरकार कृषि व किसानों को सर्वोच्च प्राथमिकता देती दिखेगी।

कृषि सम्बन्धी आँकड़ों को देखें तो पाते हैं कि बीते वर्ष कृषि विकास दर करीब 4 फीसदी रही, जबकि 2016 में यह 5 फीसदी थी। वर्ष 2014 में कृषि निर्यात 43 अरब डॉलर था, 2017 में घटकर करीब 33 अरब डॉलर रह गया। जीडीपी में कृषि का योगदान 2013-14 में 18.2 फीसदी था, वह 2016-17 में घटकर 17.4 फीसदी रह गया। इसके चलते नीति आयोग ने समीक्षा की कि देश में 80 फीसदी किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था से बाहर हैं।

केन्द्र सरकार ने भी संकेत दिया है कि 2018 में खेती-किसानी के हित में महत्त्वपूर्ण कदम उठाएगी। 2022 तक कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों की आमदनी दोगुनी करने के लिये योजना प्रस्तुत की है। इसमें फसलों का उत्पादन बढ़ाना, लागत कम करना, उत्पादन के बाद होने वाले नुकसान को कम करना और कृषि व उससे जुड़े बाजारों को सुधार प्रमुख रूप से शामिल किया गया है।

2018 में सरकार को किसानों को मुस्कुराहट देने के लिये बाजार समर्थक सुधारों की डगर पर आगे बढ़ना होगा।

1. कृषि जिंसों की कीमतों में गिरावट के समय तत्काल हस्तक्षेप के लिये राज्यों को सक्षम बनाना होगा।
2. चना, अरहर, तिलहन जैसी फसलों के दाम समर्थन मूल्य से नीचे पहुँच गए हैं। कीमतों में स्थिरता लाने को राज्यों को धन आवंटन करना होगा।
3. कृषि उत्पादों के निर्यात पर रोक बन्द हो, ताकि किसानों को वैश्विक स्तर पर लाभ मिल सके।
4. निर्यातोन्मुखी कृषि सामग्री के हवाई परिवहन पर जीएसटी दर 18 फीसदी से कम कर 5 फीसदी की जानी चाहिए।
5. देश में उत्पादन का मात्र 10 फीसदी हिस्सा प्रसंस्कृत होता है, इसे बढ़ाकर 15 फीसदी किया जाए।
6. किसानों की आय बढ़ाने के लिये कच्चे माल के मूल्य, उत्पाद के विपणन, जमीन के प्रबन्धन पर विशेष ध्यान देना होगा।
7. पुराने पड़ चुके अनिवार्य जिंस अधिनियम को समाप्त करना होगा।
8. घरेलू कीमतों को सीमा शुल्क से सम्बद्ध किया जाना होगा, ताकि आयात स्थानीय उपज से सस्ते न हो सकें।
9. देशभर में किसानों को समर्थन मूल्य का वास्तविक लाभ दिलाने के लिये मध्य प्रदेश सरकार द्वारा किसानों को उनके उत्पाद का लाभकारी मूल्य दिलाने के उद्देश्य से शुरू की गई मुख्यमंत्री भावान्तर भुगतान योजना जैसी कोई आदर्श योजना लागू किये जाने पर विचार किया जाना चाहिए

 

डॉ. जयंतीलाल भंडारी

 

 

 

happy holy

Kisan help - 1 March 2018 - 11:10pm

Pages