Feed aggregator

जल ,जंगल और जमीन को लेकर हो सकता है तीसरा विश्व युद्ध

Kisan help - 15 February 2019 - 7:17pm

जल ,जंगल और जमीन को लेकर हो सकता है तीसरा विश्व युद्ध ऐसे कयास बहुत ही दिनों से लगाये जा रहे हैं लेकिन कब होगा ऐसा निश्चित रूप में कह पाना मुश्किल है।केपटाउन में पानी खत्म हो ने के बाद यह सत्य होता नजर आ रहा है कि 2040 के लगभग जब दुनिया के अधिकतर बड़े शहरों में पानी खत्म हो जाएगा और इस दौड़ में भारत के भी बहुत से शहर गिनती में हैं।

पाकिस्तान का सीमा विवाद या चीन द्वारा बार बार भारत की सीमा पर कब्जा करने के पीछे कई दिनों से मैने मनन किया कि क्या वजह हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है? भारत का उत्तरी क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों और पानी से परिपूर्ण है।देश की सबसे ज्यादा जल प्रवाह वाली नदियां उत्तर भारत में ही हैं । देश के बड़े हिस्से में इस समय सूखे का कहर है. खेती की बात छोड़िये पीने के पानी की भी भारी किल्लत देश के कई हिस्सों में इस समय बनी हुई है ।

 

आज़ादी मिले 70 वर्ष होने के बाद भी हम सूखे और बाड़ जैसी समस्याओं से स्थायी निजात नहीं पा सके है। इसके पीछे बड़ा कारण हमारे राजनेताओं की संकुचित सोच और अक्षमता तथा नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार है। तीसरे विश्व युद्ध से पहले गृह युद्ध आपने नासिक में गोदावरी तट पर मौजूद पवित्र रामकुंड के बारे में तो जरूर सुना होगा। ऐसी मान्यता है कि वनवास के दौरान राम और सीता ने यहीं स्नान किया था । हर साल यहां गुड़ी पड़वा पर्व के मौके पर हजारों श्रद्धालु पवित्र डुबकी के लिए यहां जुटते हैं । गोदावरी तट पर स्थित होने के कारण कभी ऐसा नहीं हुआ कि इस कुंड में पानी न हो.इस साल यह कुंड पूरी तरह सूख गया । हालात यह हुए कि नासिक नगर पालिका ने टैंकर्स से पानी मंगवाकर रामकुंड को लबालब भरा, ताकि श्रद्धालुओं की भक्ति में कोई कमी न रहे। इस वक्त महाराष्ट्र का एक बड़ा इलाका पानी के लिए त्राहिमाम कर रहा है.ऐसे में तो अच्छा होता कि रामकुंड को खाली ही छोड़ दिया जाता, ताकि हजारों लोगों के पास यह मैसेज तो जरूर पहुंचता कि आज नहीं संभले तो आने वाला वक्त और भी बुरा गुजरेगा । आज डुबकी लगाने को टैंकर से पानी भरने की नौबत आ गई कल हो सकता है यह टैंकर भी न हो। मंथन का वक्त है कि हम पानी के लिए कितना गंभीर हैं।

 

इस वक्त देश के करीब 12 राज्य सूखे की मार झेल रहे हैं । इनमें से दस राज्य तो ऐसे हैं जहां किसानों की हालत सबसे अधिक खराब है.आजाद भारत में ऐसा पहली बार है कि गर्मी की शुरुआत से ही एक साथ इतने राज्यों की हालत खराब है.धीरे-धीरे यह बद से बदतर ही होती जाएगी.ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को जो फटकार लगाई है उसके कई मायने हैं.कोर्ट ने केंद्र की गंभीरता पर सवाल उठाए हैं । केंद्र के साथ-साथ कई राज्यों ने जो रवैया अपनाया है वह भी अपने आप में काफी गंभीर सवाल पैदा करता है।

बिहार, हरियाणा और गुजरात सरकार ने तो हद ही कर दी। वे सूखे के हालात पर सही तथ्य भी पेश नहीं कर सके, जिसके कारण सुप्रीम कोर्ट ने इन राज्य सरकारों को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि क्या आप यहां पिकनिक मनाने आते हैं। मौसम विभाग ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि सामान्य से कम बारिश होने की स्थिति में इस बार स्थिति गंभीर रहेगी.सूखे से सबसे अधिक प्रभावित गरीब वर्ग और किसान है.पूरे देश से खबरें आ रही हैं.सूखे की सबसे अधिक मार महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, बुंदेलखंड, कर्नाटक आदि राज्यों में है.कर्नाटक में तो स्थिति यह है कि कृष्ण सागर बांध ही सूख गया है.कई राज्यों में पहली बार पानी का गंभीर संकट सामने आया है, जबकि मराठवाड़ा में तो यह स्थिति पिछले करीब पांच सालों से है.यहां पानी बंटने के कई प्वाइंट्स निर्धारित हैं, जहां लंबे समय से धारा-144 लगी हुई है. हाल ही में केंद्रीय जल आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि देश भर के जलाशयों में पानी की भारी कमी रिकॉर्ड की गई है.ऐसे में गंभीर संकट की तरफ इशारा है.आंकड़ों के अनुसार देश के 91 प्रमुख जलाशयों में मार्च के अंत तक उनकी कुल क्षमता के 25 फीसदी के बराबर ही पानी बचा था. महाराष्ट्र में तो यह आंकड़ा सिर्फ 21 फीसदी ही है.अदालतें लगातार अपनी सख्त टिप्पणियों से सरकारों का ध्यान पानी की गंभीर समस्याओं की तरफ दिला रही हैं.एक तरफ जहां सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सहित कई राज्यों को फटकार लगाई है, वहीं दूसरी तरफ बांबे हाईकोर्ट ने इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के लिए पानी की बर्बादी को आपराधिक बर्बादी माना है.वहां एक जनहित याचिका में बताया गया है कि महाराष्ट्र में तीन जगहों मुंबई, नागपुर और पुणे में आईपीएएल के बीस मैच प्रस्तावित हैं.ऐसे में पिच और मैदान की देखरेख में करीब 65 लाख लीटर पानी खर्च होगा.सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि जो राज्य लगातार तीन साल से सूखे की मार झेल रहा है वहां पानी की इस तरह की बर्बादी कहां तक जायज है. आज की जल प्रबंधन व्यवस्था से केवल उद्योगपति ही खुश हैं। सरकारें समस्या से वाकिफ होने के बावजूद कॉर्पोरेट दबाव के आगे नतमस्तक हैं। ज्यादा नहीं, अगले 10 साल बाद ही भारत व्यापक जल संकट के मुहाने पर खड़ा होगा।

 

इसमें पानी की कमी, मिट्टी का कटाव और कमी, वनों की कटाई, वायु और जल प्रदूषण ने और इजाफा ही किया है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का अनुमान है कि तापमान में 3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि सालाना गेहूं की पैदावार में 15-20% की कमी कर देगी और पानी को रसातल में पहुंचा देगी।जलसंकट को भांपते हुए कनाडा, इजराइल, जर्मनी, इटली, अमेरिका, चीन और बेल्जियम जैसे देशों की कंपनियां संग्रहण, बचाव और सीमित दोहन के लिए दीर्घकालीन योजनाएं लागू कर चुकी हैं जबकि हम इन्हीं देशों की कंपनियों को हमारे प्राकृतिक जल संसाधनों का दोहन करने का लाइसेंस जारी करते जा रहे हैं। इस सार्वभौमिक सत्य को स्वीकारने में तनिक भी संकोच नहीं होना चाहिए कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए ही लड़ा जाएगा।

 

देश में औसत तापमान 47 डिग्री सेल्सियस पहुंच चुका है। तेलंगाना, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र के उत्तरी इलाके बीड, नांदेड, परभणी, जालना, औरंगाबाद, नाशिक और सतारा सूखे की स्थिति का सामना कर रहे हैं। दक्षिणी कर्नाटक के ग्रामीण इलाकों में पानी के नाम पर दंगे भी हुए। कम बारिश ने पूरे देश में भूजल स्तर घटा दिया है। आबादी का घनत्व ज्यादा है, खेती के तरीके असंवेदनशील हैं और औद्योगीकरण बड़े स्तर पर हो रहा है। शहरीकरण व औद्योगीकरण में अनियंत्रित वृद्धि, बड़े पैमाने पर कृषि का विस्तार तथा जंगलों के नष्ट होने से सब गड्ड-मड्ड हो गया है। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का नतीजा हम नेपाल, उत्तराखंड, चीन, चिली सहित कई देशों में देख ही रहे हैं। दुनिया के कुल क्षेत्रफल का सिर्फ 2.4% होने के बावजूद भारत में विश्व की 18% जनसंख्या रहती है और जो वर्ष 2016 तक 1.26 अरब हो जाएगी और अगले 35 साल में भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा। ऐसे में हर प्यासे के हलकों को तर कर पाना सबसे बड़ी चुनौती होगी।

जैविक कीटनाशक अपनाकर पानी प्रदूषण से बचाएं

Kisan help - 13 January 2019 - 8:02pm

विकास की अंधी दौड़ में हमने अपनी परम्परागत खेती को छोड़कर आधुनिक कही जाने वाली खेती को अपनाया। हमारे बीज- हमारी खाद- हमारे जानवर सबको छोड़ हमने अपनाये उन्नत कहे जाने वाले बीज, रसायनिक खाद और तथाकथित उन्नत नस्ल के जानवर। नतीजा, स्वावलम्बी और आत्मनिर्भर किसान खाद, बीज, दवाई बेचने वालों से लेकर पानी बेचने वालों और कर्जा बांटने वालों तक के चँगुल में फंस गये। यहां तक की उन्नत खेती और कर्ज के चंगुल में फँसे कई किसान आत्म हत्या करने तक मजबूर हो गये । खेती में लगने वाले लागत और होने वाला लाभ भी बड़ा सवाल है, किन्तु खेती केवल और केवल लागत और लाभ ही नहीं है हमारे समाज और बच्चों का पोषण, मिट्टी की गुणवत्ता, पर्यावरण, जैव विविधता, मिट्टी और पानी कर संरक्षण, जानवरों का अस्तित्व तथा किसानों और देश की सम्प्रभुता भी खेती से जुड़े हुए व्यापक मसले है।

हम तो परम्परागत तौर पर मिश्रित और चक्रीय खेती करते आये हैं। जिसमें जलवायु, मिट्टी की स्थिति और पानी की उपलब्धता के आधार पर बीजों का चयन होता रहा है। हमारे खेतों में हरी खाद एवं गोबर की खाद का उपयोग होता था। हमारे पूर्वज पूर्ण जानकार थे पानी वाली जगहों पर पानी वाली और कम पानी वाली जगहों पर कम पानी वाली फसल करते थे। हमारे खेतों में खेती के अलावा, फल वाले पौधे, इमारती और जलाऊ लकड़ी के पेड़, जानवरों के लिये चारा सब कुछ तो होता था । किन्तु एक फसली उन्नत और आधुनिक कही जाने वाली खेती के चक्रव्यूह में हमने अपनी परम्परागत और उन्नतशील खेती को छोड़ दिया । हमारी खेती केवल अनाज पैदा करने का साधन मात्र नहीं है बल्कि हमारी संस्कृति से जुड़ी हुयी है।

 

हमारी खेती, जल-जमीन-जंगल, जानवर, जन के सहचर्य- सहजीवन और सह-अस्तित्व की परिरचायक है। ये पॉचों एक दूसरे का पोषण करने वाले और एक दूसरे को संरक्षण देने वाले है सबका जीवन और अस्तित्व एक दूसरे पर निर्भर है और ये भी सही है कि जन के ऊपर स्वयं के विकास के साथ-साथ बाकी सबके भी संतुलित संरक्षण और संवर्धन की जिम्मेदारी है। हमारी परम्परागत खेती पद्वति सहजीवन और सह अस्तित्व की परिचायक रही है, जबकि आधुनिक खेती संसाधनों के बेहतर प्रयोग के स्थान पर उनके अधिकतम दोहन में विश्वास करती है। अब तो अधिकतर कृषि वैज्ञानिक, जानकार आदि भी मानने लगे है कि हमारी परम्परागत फसल पद्वति ही बेहतर और टिकाऊ है। यह बात तो सही है कि आबादी-बढ़ने के कारण जमीने बँट गयी है और जोत का आकार छोटा हो गया है। किन्तु छोटी जोत का मतलब अलाभकारी खेती तो नही है। खेती का लाभ फसल के उत्पादन के साथ उसमें लगने वाली लागत और फसल पद्वति के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों के रूप में ही नापा जा सकता है।

 

हमारी अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिहाज से एक ओर तो हमें जमीनों उत्पादकता बढ़ाने के प्रयास करने है और दूसरी ओर खेती में लगने वाली लागत को कम करते हुए पर्यावरण संतुलन को बनाये रखना होगा । हम सब को मिलकर "छोटी जोत अलाभदायक हैं," जैसे दुष्प्रचारों से निपटने के कारगर उपाय भी ढूंढ़ने होंगे । हम सब मिलकर वैज्ञानिक सोच, परम्परागत ज्ञान, और फसल पद्वतियों के संयोजन से लागत कम करते हुये लाभकारी और पर्यावरण हितैषी खेती को अपना कर अपनी फसल, खेत पानी आदि की गुणवत्ता को बढ़ा सकते हैं।

 

अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिये हमें अपनी खेती को बेहतर बनाना होगा । रसायनिक खादों, कीटनाशकों, पानी और बीज के अनियंत्रित उपयोग को रोकते हुये एवं टिकाऊ खेती पद्वतियों को अपनाते हुए खेती की लागत कम और उत्पादकता बढ़ाने के प्रयास करने होंगे । टिकाऊ खेती में ऐसा कुछ नही है जो हम पहले से नहीं जानते हैं- हमें रासायनिक खादों और कीटनाशकों का मोह त्याग कर जैविक खाद (हरी खाद, गोबर की खाद) जैविक कीटनाशक (गोबर, गौमूत्र, नीम, गुड़, तुलसी, खली आदि) का उपभोग बढ़ाना होगा, आवश्यकता के अनुसार कूडवार खेती अपनानी होगी । जिससे न केवल खेती की लागत में कमी आयेगी अपितु कुल उत्पादन में वृद्वि के साथ मिट्टी और पानी का सरंक्षण भी होगा । हम अपनी छोटी जोत की खेती की योजना बनाकर मिश्रित, चक्रिय, जैविक खेती अपनाकर लाभदायक और पर्यावरण हितैषी जोत में परिवर्तित कर सकते है ।

कृषि अपशिष्ट के कार्बनिक पदार्थ को जलाने से हवा जहरीली

Kisan help - 6 January 2019 - 10:21pm

सर्दियां शुरू होने के साथ ही उत्तर भारत को अकसर हर साल भारी परेशानी उठानी पड़ती है क्योंकि 20 करोड़ से ज्यादा निवासियों वाले इस क्षेत्र की हवा जहरीली हो जाती है. हवा में घुले इस जहर की वजहों की बात आती है तो अक्सर उंगलियां उन हाथों की ओर उठती हैं, जो देशभर के लोगों का पेट भरते हैं.
देश का अन्न भंडार कहलाने वाले क्षेत्र के किसानों को कृर्षि अपशिष्ट खेतों में न जलाने के लिए कहा जाता है क्योंकि इससे नयी दिल्ली, लखनऊ और इलाहाबाद जैसे बड़े शहरों की हवा दूषित हो जाती है.
इस बात में कोई संदेह नहीं है कि मानसून खत्म होने के बाद देश के अन्न के कटोरे के रूप में मशहूर हरियाणा और पंजाब के खेतों में बड़ी मात्रा में शेष बची पराली जलाई जाती है. इनमें लगाई जाने वाली आग इतनी व्यापक होती है कि धरती से कुछ सौ किलोमीटर ऊपर मौजूद उपग्रहों तक भी इनकी जानकारी पहुंच जाती है. इस दौरान पश्चिमी हवाएं भी चलती हैं और उत्तर भारत पर धुंए का एक बड़ा गुबार सा छा जाता है. उपग्रह से ली गई तस्वीरों में यह गुबार साफ दिखाई देता है और भारत की राजधानी में सत्ता के के गलियारों में खतरे की घंटी बज जाती है. पिछली सर्दियों में भारत के प्रधान न्यायाधीश ने सख्त आदेश जारी किए थे और कार-पूलिंग करके अपने हिस्से का योगदान भी दिया था. फिर भी हवा दूषित ही रही. दिल्ली की हवा को दूषित करने में वाहनों, उद्योगों, ऊष्मीय ऊर्जा संयंत्रों और खेतों में लगाई जाने वाली आग का हाथ है. कोई नहीं जानता है कि बड़ा दोषी कौन है?किसानों की ओर उंगली उठाना आसान है लेकिन इस बात का अहसास बहुत कम है कि किसानों द्वारा कृषि अपशिष्ट जलाए जाने के पीछे कृषि का एक गहरा संकट है और यह एक स्वस्थ जीवन, हवा, पानी और जमीन के लिए जरूरी तत्वों के साथ जुड़ा हुआ है.
आज हरियाणा और पंजाब के खेतों पर बोझ इतना ज्यादा है कि वे अपनी उत्पादकता खोने लगे हैं. हरित क्रांति ने उन्हें रिणग्रस्त बंजर जमीनों के रूप में बदल दिया है.
कई साल पहले तक क्षेत्र में साल में एक या दो फसलें उगाई जाती थीं और इसके बीच की अवधि में खेतों को खाली छोड़ दिया जाता था.
खेतों को खाली छोड़े जाने की यह अवधि बेहद महत्वपूर्ण होती थी क्योंकि यह कृषि अपशिष्ट के कार्बनिक पदार्थ को खत्म होने का और ऊपरी मिट्टी से मिल जाने का मौका देती थी.
आज अधिकतर स्थानों पर चार नहीं तो कम से कम तीन फसलें तो उगाई जा ही रही हैं. एक फसल की कटाई के साथ ही किसान दूसरी फसल बोने की जल्दी होने लगती है.
ऐसे में पराली के सही इस्तेमाल का समय ही नहीं मिलता और दूसरी फसल बोने की जल्दी में किसानों के सामने इस पराली से छुटकारा पाने का एकमात्र उपाय उसे जला देना ही होता है, जिससे पैदा होने वाली राख जाकर मिट्टी में मिल जाती है.
यह एक दुष्चक्र है और कई दशकों से चली आ रही गड़बड़ कृषि नीतियों की वजह से किसान अपने खेतों में ज्यादा से ज्यादा फसले उगाने के लालच में फंसा हुआ है.
भारतीय कृषि अनुसंधानकर्ता देश को कम से कम अवधि में उग सकने वाली किस्में विकसित करके देते हैं और किसान बिना किसी इनकार के उसे अपनाते जाते हैं. कोई भी व्यक्ति यह नहीं सोचता कि इससे मिट्टी की सेहत पर क्या असर पड़ रहा है? अब तो इससे हवा भी दूषित होती जा रही है.
आप मई या जून में यदि पंजाब और हरियाणा से होकर गुजरें तो भरी गर्मी में आपको खेतों में पानी भरा हुआ दिखेगा। धरती की गहराई से निकाले गए इतने अधिक पानी में वहां धान बोया जा रहा होता है.
मानसून से कम से कम छह-आठ हफ्ते पहले किसान सहारा रेगिस्तान जैसे मौसम में धान की खेती शुरू करते हैं. धान के लिए पानी बहुत ज्यादा चाहिए, इसलिए खेतों को कृत्रिम तौर पर पानी उपलब्ध कराया जाता है.
समय से पूर्व धान बोए जाने से दो गड़बड़ियां होती हैं. एक तो पानी निकालने के लिए भारी मात्रा में ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाता है. इसके कारण भूजल का स्तर गिरता जाता है.
अमेरिका में नासा के गोड्डार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर के मैट रोडेल ने कहा, ‘यदि भूजल के टिकाऊ इस्तेमाल के लिए उपाय सुनिश्चित नहीं किए गए तो 11.4 करोड़ की आबादी वाले इस क्षेत्र में कृषि उत्पादन के खत्म हो जाने और पेयजल की भारी कमी जैसे नतीजे भी सामने आ सकते हैं’.

दूसरी बड़ी समस्या तब होती है जब मानसून के बाद फसल काटी जाती है. तब सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर चावल बेचे जाते हैं और पीछे किसान के पास बड़ी मात्रा में पुआल बच जाता है.
दुर्भाग्यवश धान के पुआल में बड़ी मात्रा में सिलिका होता है. यह बेहद कड़ा होता है जिसके कारण पशुओं को इसे खाने में भारी दिक्कत होती है. अब किसानों को अगली फसल बोने की जल्दी होती है इसलिए उनके पास कृषि अपशिष्ट को जलाने के अलावा कोई विकल्प बचता ही नहीं.
पुआल से कार्बनिक कंपोस्ट बनाने का इंतजार करना या इसे एकत्र करके कृषि अपशिष्ट से उपयोगी चीजें बनाने वाले स्थानों पर भेजने में लगने वाला समय और धन दोनों ही ज्यादा हैं. ऐसे में किसानों को अपशिष्टों को जला देना ही एकमात्र उपाय दिखाई पड़ता हैं.
मिट्टी की ऊपरी सतह के लिए कार्बनिक पदार्थ बेहद महत्वपूर्ण हैं लेकिन उत्तर पश्चिम भारत में यह मात्रा तेजी से कम हो रही है. ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि यह मिट्टी जल्दी ही बंजर हो सकती है.
पंजाब के पर्यावरण की मौजूदा स्थिति के बारे में स्थानीय सरकार द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया, ‘राज्य में पैदा होने वाले 80 फीसदी पुआल (1.84 करोड़ टन) और लगभग 50 फीसदी पराली (85 लाख टन) हर साल खेतों में जला दी जाती है.
इससे जमीन की उर्वरता पर तो असर पड़ता ही है, साथ ही इससे निकलने वाली मीथेन, कार्बन डाइ ऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइडों और सल्फर डाइ ऑक्साइड गैसों और कणों के कारण वायु प्रदूषण भी होता है. इनके कारण सांस, त्वचा और आंखों से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं’.
रिपोर्ट के अनुसार, ‘जरूरत से ज्यादा खेती भी जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार कार्बन डाइ ऑक्साइड, मेथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है’.
जब किसानों के पास व्यापक स्वदेशी जानकारी है तो फिर वे ऐसे नुकसानदायक काम क्यों कर रहे हैं? दुर्भाग्यवश इनका दोष सरकार की कृषि-आर्थिकी की नीतियों पर जाता है.
वायु प्रदूषण की पूरी समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री की फौरी तौर पर लाई गई ‘सम-विषम योजना’ या किसानों को कृषि अपशिष्ट न जलाने का आदेश सुनाया जाना और दंडित करने का प्रावधान काम नहीं करने वाला.
दिल्ली और उत्तर भारत के लोगों का दम घुटने से बचाने के लिए कृषि अर्थव्यवस्था की संरचना को एक नए समग्र ढंग से निर्धारित करना होगा

अजवाइन की खेती

Kisan help - 2 January 2019 - 7:52pm

यह धनिया कुल (आबेलीफेरा) की एक महत्वपूर्ण मसाला फसल है। इसका वानस्पतिक नाम टेकिस्पर्मम एम्मी है तथा अंग्रेजी में यह बिशप्स वीड के नाम से जाना जाता है। इसके बीजों में 2.5-4% तक वाष्पशील तेल पाया जाता है।अजवाइन(celery seed )खजीज तत्वों का अच्छा स्रोत हैं। इसमें 8.9% नमी, 15.4% प्रोटीन, 18.1% वसा, 11.9% रेशा, 38.6% कार्बोहाइड्रेट, 7.1% खनिज पदार्थ, 1.42% कैल्शियम एवं 0.30% फास्फोरस होता हैं। प्रति 100 ग्राम अजवाइन से 14. 6मी.ग्रा. लोहा तथा 379 केलोरिज मिलती हैं।

 

औषधीय गुण
अजवाइन के पौधे के प्रत्येक भाग को औषधी के रूप में काम में लाया जाता हैं। अजवाइन पेट के वायुविकार, पेचिस, बदहजमी, हैजा, कफ, ऐंठन जैसी समस्याओं और सर्दी जुखाम आदि के लिए काम में लिया जाता हैं, तथा गले में खराबी, आवाज फटने, कान दर्द, चर्म रोग, दमा आदि रोगों की औषधी बनाने के काम में लिया जाता हैं। अजवाइन के सत को दंतमंजन एवं टूथपेस्ट, शल्य क्रिया में प्रतिरक्षक के तोर पर प्रयोग किया जाता हैं। इसके अलावा यह बिस्कुट फल, सब्जी संरक्षण में काम आता हैं।

 

जलवायु
उत्तरी अमेरिका, मिस्त्र ईरान, अफगानिस्तान तथा भारत में महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, मध्य्प्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाब, तमिलनाडु, बिहार, आंध्रप्रदेश तथा राजस्थान के कुछ हिसों में अजवाइन की व्यावसायिक खेती की जाती हैं। अजवाइन की बुवाई के समय मौसम शुष्क होना चाहिए। अत्यधिक गर्म एवं ठंडा मौसम इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं होता हैं। अजवाइन पाले को कुछ स्तर तक सहन कर सकती हैं।

 

राजस्थान राज्य में इसकी खेती 15483 हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती हैं जिससे 5450 टन उत्पादन एवं 352 की.ग्रा. प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती हैं (वर्ष 2009-10 के अनुसार)। इसकी खेती मुख्यतः चित्तौडगढ, उदयपुर, झालावाड़, राजसमंद, भीलवाड़ा एवं कोटा में की जाती हैं।

अजवाइन कम लागत की मसाला फसल हैं तथा इसका उत्पादन बढ़ाने के लिए यदि उन्नत तकनीकी से खेती की जाये तो इसके उत्पादन एवं गुणवत्ता दोनों में वृद्धि की जा सकती हैं। इसके लिए ध्यान देने योग्य बिंदुओं का विवरण इस प्रकार से हैं:-

उन्नत किस्में
लाम सलेक्शन-1
135 से 145 दिन में पक कर तैयार होने वाली इस किस्म की औसत उपज 8-9 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती हैं।

लाम सलेक्शन-2
इसके पौधे झाड़ीदार होते हैं इसकी औसत उपज 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती हैं।

आर.ए. 1-80
यह किस्म 170-180 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं। दाने बारीक़ परन्तु अधिक सुगंधित होते हैं इसमें 10-11 क्विंटल/हेक्टेयर तक उपज प्राप्त होती हैं। इस किस्म पर सफेद चूर्णिल आसिता रोग का प्रकोप अधिक रहता हैं।

भूमि
अजवाइन एक रबी की मसाला फसल हैं। इसकी खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट मिटटी सर्वोत्तम होती हैं। सामान्यतः बलुई दोमट मिटटी जिसका पि.एच. मान 6.5 से 8.2 तक है, में अजवाइन सफलतापूर्वक उगाई जा सकती हैं। जहां भूमि में नमी कम हो वहां सिंचाई की व्यवस्था आवश्यक हैं।

 
खेती की तैयारी
खेत तैयार करने के लिए मिटटी पलटने वाले हल से जुताई करें तथा इसके बाद 2 जुताई देशी हल से कर खेत को भली-भांति तैयार करें। अजवाइन का बीज बारीक़ होता हैं। अतः खेत की मिट्टी को अच्छी तरह भरभूरा होने तक जुताई करें।

खाद एवं उर्वरक
अजवाइन की भरपूर पैदावार लेने के लिए 15-20 दिन पूर्व 20-25 टन सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर की दर से अच्छी तरह मिलाए। उर्वरक के रूप में इस फसल को 20 किग्रा. नत्रजन, 30 किग्रा फास्फोरस एवं 20 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से देवें। फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा एवं नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई से पूर्व खेत में डाल देवें। नत्रजन की शेष आधी मात्रा बुवाई के लगभग 25-30 दिन बाद खड़ी फसल में देवें।

बीज दर एवं बुवाई
अजवाइन की बुवाई का उचित समय सितम्बर से नवम्बर होता है। इसे छिड़काव या क़तर विधि से बोया जाता है। एक हेक्टेयर के लिए 4-5 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। छिड़काव विधि के लिए बीजों को इसकी बीज दर से आठ से दस गुना बारीक छनि हुई मिट्टी के साथ मिलाकर बुवाई करे इससे बीज दर सही रखने में मदद मिलती है। कतारों में बुवाई करना ज्यादा उपयुक्त है। इस विधि में कतार से कतार की दुरी 30-40 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दुरी 15-25 से.मी. रखें। इसमें बीजों का अंकुरण 10-15 दिनों में पूर्ण होता है।

सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई
अजवाइन की फसल काफी हद तक सूखा सहन कर सकती है। इसका सिंचित और असिंचित दोनों ही परीस्थितियों में उत्पादन किया जा सकता है। सामान्यतया अजवाइन के लिए 2-5 सिंचाई की आवश्यकता होती है। जब पौधे 15-20 से.मी. तक बड़े हो जाये तब पौधों की छंटाई करके पौधे से पौधे की दुरी में पर्याप्त अंतर रखें। फसल में जल निकासी की भी उचित व्यवस्था करे ताकि पौधों को उचित बढ़वार के लिए पर्याप्त स्थान एवं वातावरण मिल सके।

फसल कटाई एवं उपज
कटाई की उपयुक्त अवस्था में फसल पीली पड़ जाती है तथा दाने सुखकर भूरे रंग के हो जाते है। अजवाइन की फसल लगभग 140-150 दिन में पककर तैयार हो जाती है। कटाई पश्चात फसल को खलिहान में सुखावें तथा बाद में गहाई और औसाई की जाय। साफ बीजों को 5-6 दिन सूखा कर बोरों में भर कर भंडारण करे।

अजवाइन का फसल में प्रमुख रोग
छाछया  रोग

इस रोग के प्रकोप से पत्तियों पर सफेद चूर्ण दिखाई देता है। इसके नियंत्रण के लिए  घुलनशील गंधक 2 ग्राम/लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। आवश्यकता पड़ने पर इसे 15 दिन बाद दोहरायें।

झुलसा रोग
इस रोग के लक्षण में पत्तियों पर भूरे रंग के धब्बे बनते है एवं अधिक प्रकोप में पत्तियां झुलस जाती है। इस रोग के रोकथाम हेतु मेंकोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी मिलाकर छिड़काव करें। जरुरत होने पर दूबर छिड़काव करें।

उपज
सामन्यतः एक हेक्टेयर में अजवाइन की उपज 10-12 क्विंटल तक की पैदावार प्राप्त होती है। अजवाइन बहुउपयोगी होने के साथ विदेशों में विक्रय कर विदेशी मुद्रा कमाने का अच्छा स्रोत है।

अगर किसान भाई अजवाइन की खेती संबंधित मुख्य बिंदुओं को ध्यान में रखकर खेती करें तो अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है। साथ ही वह कम लागत में अधिक मुनाफा प्राप्त कर सकते है।

organic farming: अजवाइनजैविक खेती: औषधिफ़सलagricare: जैविक कृषि सुरक्षा

तंबाकू की खेती

Kisan help - 29 December 2018 - 5:13pm

किसानों के लिए नकदी फसलें कम लागत व कम समय में ज्यादा लाभ देने वाली मानी जाती हैं. नकदी फसलों की प्रोसेसिंग व मार्केटिंग के बारे में जानकारी ले कर किसान अच्छा फायदा ले सकते हैं. इन्हीं नकदी फसलों में तंबाकू की खेती खास है. तंबाकू की खेती न केवल कम समय में की जाती है, बल्कि इस के मामले में किसानों को मार्केटिंग के लिए इधरउधर भटकना नहीं पड़ता है. तंबाकू की फसल की कटाई व प्रोसेसिंग के बाद किसान के खेत से ही फसल की बिक्री आसानी से हो जाती है. भारत में तंबाकू की कई किस्में उगाई जाती हैं. किन किस्मों को उगाना है, यह उस के अलगअलग इस्तेमाल पर निर्भर करता है. घाटे की खेती से उबरने के लिए तंबाकू की खेती एक अच्छा तरीका साबित हो सकती है

बोने की विधि

तंबाकू की पौध तैयार के लिए बीज की नर्सरी क्षेत्र में बुवाई विभिन्न प्रकार से की जाती है कुछ कृषक बीजों को जल के साथ मिलाकर फव्वारे से नर्सरी क्षेत्र में फैला देते हैं कुछ किसान बीज उर्वरक के साथ मिलाकर छिड़काव विधि से बो देते हैं कुछ वीडियो को राखिया रेत के साथ मिलाकर क्षेत्रवाद बुवाई करते हैं आदि प्रकार से करते हैं। तम्बाकू के बीचड़े की रोपाई से पूर्व खेत को अच्छी तरह जुताई करें, ताकि उसमें ढेले न रहे। खेत में पाटा चला कर समतल कर दें। दस टन प्रति एकड़ कम्पोष्ट या गोबर, खल्ली 1112 किलो, रोपनी पूर्व यूरिया 80 किलो, कैल्सियम 86 किलो, फॉस्फेट 150 किलो, पोटाश 45 किलो प्रति एकड़ जोत में मिला दें।

खेत की जुताई व मिट्टी की तैयारी

तम्बाकू के लिए गहरी दोमट अथवा मिश्रित लाल व कछारी मिट्टी उपयुक्त रहती है। तम्बाकू भूमि में से उपजाऊ तत्वों को बहुत जल्दी खींच लेती है, अतः पोटाश, फ़ॉस्फ़ोरिक ऐसिड और लोहांश के रूप में खाद की आवश्यकता पड़ती है।

बीज की जानकारी

तंबाकू की 1 हेक्टेयर फसल की रोपाई के लिए लगभग 100 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में तंबाकू के 50 ग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है।

उर्वरक की जानकारी

खाद एवं उर्वरक 1 हेक्टेयर फसल की 2 वर्ग मीटर नर्सरी तैयार करने के लगभग 100 किग्रा सड़ी हुई गोबर की खाद दवाई के 1 माह पूर्व तैयारी में मिला देनी चाहिए 1 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाली हुक्का तंबाकू की नर्सरी के लिए नाइट्रोजन फास्फोरस और पोटाश की संतुलित मात्रा में 120 80 व 40 किग्रा है सिगरेट तंबाकू के 1 हेक्टेयर पौधा नर्सरी नाइट्रोजन फास्फोरस और पोटाश की संतुलित मात्रा 100 -60 व 30 किग्रा देना चाहिए।

जलवायु और सिंचाई

इसके लिए साधारणतः 50 से 100 सेटीमीटर वर्षा ही चाहिए। इससे अधिक वर्षा वाले भागों में इसकी खेती नहीं की जा सकती। पत्तियों के पकने के समय वर्षा हो जाने से इसकी किस्म बिगड़ जाती है।

सिंचाई व खरपतवार

तंबाकू की रोपाई के बाद हर 15 दिनों पर सिंचाई करते रहना चाहिए. फसल कटाई के 15 दिनों पहले खेत की सिंचाई रोक दी जाती है. फसल की अच्छी पैदावार व गुणवत्ता के लिए पहली निराई 10-15 दिनों बाद करनी चाहिए. फसल में घासफूस के नियंत्रण के लिए जरूरत के हिसाब से 3 बार निराई करना जरूरी होता है.

बीमारियां व कीट

तंबाकू की फसल में मोजैक बीमारी का ज्यादा प्रकोप देखा गया है. इस के अलावा शुरुआती अवस्था में आग्र पतन, चित्ती, पडकुंचन रोगों का प्रकोप पाया जाता है. इस के अलावा तंबाकू की सूंड़ी, इल्ली, गिडार, तना छेदक, माहू, कटुआ व दीमक कीटों का प्रकोप देखा गया है. ये सभी कीट व रोग पौधों को पूरी तरह खत्म कर देते हैं. कीटों की रोकथाम के लिए कार्बेनिल 10 फीसदी धूल का छिड़काव फसल में कीट का प्रकोप दिखाने के समय ही कर देना चाहिए. इस के अलावा क्लोर पायरीफास 20 ईसी या प्रोफेनोफास 50 ईसी का छिड़काव करना चाहिए. बीमारी की रोकथाम के लिए कार्बेंडाजिम, मैंकोजेब, थीरम, मेटालेक्जिल, डीनोकेप दवाओं का इस्तेमाल करना चाहिए. तंबाकू की फसल के लिए ज्यादा पाला व ज्यादा बारिश भी नुकसानदेह होती है. ज्यादा पाले व बारिश की दशा में फसल के सूखने व बरबाद होने के आसार बढ़ जाते हैं. ऐसे में ज्यादा बारिश व पाले वाली जगहों पर तंबाकू की खेती करने से बचना चाहिए.

फुनगों की तोड़ाई

 तंबाकू की फसल में अच्छी गुणवत्ता व पैदावार बढ़ाने के लिए उस के फुनगों की तोड़ाई करना जरूरी होता है. जब फसल 60 दिनों की हो जाए, तो हर 10 दिनों के बाद 3 बार फुनगों की तोड़ाई की जानी चाहिए. यह कोशिश करें कि पौधों में 9 से 10 पत्ते ही आने पाएं.

पौधों की कटाई

 खाने वाले तंबाकू की फसल 120 दिनों में, बीड़ी वाले तंबाकू की फसल 140 से 150 दिनों में और सिगार व चुरुट वाले तंबाकू की फसल 90 से 100 दिनों में कटाई के लायक हो जाती है. पौधों की पत्तियां जब हरी हों तभी उन की कटाई कर देनी चाहिए और कटाई के बाद 3 दिनों तक पौधों को खेत में ही छोड़ देना चाहिए. जब पत्तियां पीली पड़ जाएं तो उन को खेत से उठा कर सही जगह पर दोबारा फैला कर सूखने के लिए छोड़ देना चाहिए. इस दौरान खाने वाले तंबाकू की नसों पर चीरा लगाना जरूरी होता है. सूखने के दौरान तंबाकू में नमी व सफेदी जितनी ज्यादा आती है उतना ही अच्छा गुण, रंग, स्वाद व गंध पैदा होती है. ऐसे में तंबाकू की पलटाई समय से करते रहना चाहिए. इस से किसानों को तंबाकू का अच्छा मूल्य मिल जाता?है. घर पर करीब 1 हफ्ते तक सुखाने के बाद पत्तियों में चीरा लगा कर अलगअलग किया जाता है. उस के बाद कुछ दिनों के लिए पत्तियों को पालीथीन से ढक कर सुगंध पैदा करने के लिए छोड़ दिया जाता?है. जब उन मेंअच्छी सुगंध उठने लगती है, तो इस की गठिया बांध कर इस में पानी का छिड़काव कर के छटका जाता है. जब इस में सफेदी आने लगे तो यह मान लिया जाता है कि तंबाकू की गुणवत्ता अच्छी स्थिति में हो गई है.

मार्केटिंग व लाभ

 तंबाकू किसान ओमप्रकाश का कहना है कि ज्यादातर मामलों में खेत में खड़ी फसल ही बिक जाती है, जिसे व्यापारी करीब 25000 रुपए प्रति बीघे की दर से लेते हैं. तंबाकू की 1 एकड़ फसल के लिए करीब 15000 रुपए की लागत आती है, जबकि 1 एकड़ से फसल अच्छी होने की दशा में 4 महीने में करीब 1 लाख रुपए की आमदनी होती है. इस प्रकार लागत मूल्य को निकालने के बाद शुद्ध आमदनी करीब 85 हजार रुपए प्रति एकड़ हो जाती है. भारतीय तंबाकू की ज्यादा मांग बाहरी देशों में होने के कारण अच्छा मूल्य मिलता है. भारत द्वारा उत्पादित तंबाकू अमेरिका, रूस, फ्रांस, अफ्रीका, ब्रिटेन, सिंगापुर, बेल्जियम, हांगकांग, चीन, नीदरलैंड व जापान वगैरह देशों को भेजा जाता है. ऐसे में किसान विदेशी निर्यातक व्यापारियों से संपर्क कर के अपनी उपज का अच्छा दाम पा सकते हैं.

.

organic farming: तंबाकू

भारतीय कृषि - समस्या और समाधान

Kisan help - 25 December 2018 - 1:08pm

"भारत एक कृषि प्रधान देश है "  अक्सर कृषि लेखों (Essays on Agriculture) की शुरुआत इसी वाक्य से होती है. ग्रंथों में कहा गया है  "अन्नम वै प्राणिनां प्राणः "( अन्न प्राणियों का जीवन है अर्थात प्राण है।  प्राण ही जीवन एवं जीवन ही प्राण होता है।  प्राण नहीं तो जीवन नहीं। ) और हमसब इस तथ्य से भली भांति परिचित हैं। अन्न को उगाने की कला का नाम ही कृषि है. कृषि एक विज्ञान है जिसमे फसल को उगाने से लेकर उसके बाज़ारीकरण तक का सूक्ष्म ज्ञान निहित है. इसी विज्ञानं को जानने, समझने और उसके व्यवहारिक प्रयोग का अनवरत साधना का काम करने वाले किसान कहलाते हैं।   रोज़मर्रे की झंझावातों के साथ प्राकृतिक आपदाओं-विपदाओं से दो हाथ कर हमारे लिए दो वक़्त के निवाले का जुगाड़ करने वाले ये किसान हमारे समाज का अतिमहत्वपूर्ण अंग है।  यूँ कहे की, हमारे जीवन की प्राणवायु शक्ति को चलायमान रखने के एक महत्वपूर्ण कारक को निष्ठापूर्वक पालन करनेवाले ये किसान है. 

  भारत में कृषि और किसानो की हालत दिनों-दिन बदतर होती जा रही हैं जिसके कारण अनेक किसान आत्महत्या तक करने पर मजबूर हो जा रहे हैं. भारत में आज भी 60% से 70% लोग कृषि पर निर्भर हैं. इस समस्या को हर सरकार जानती हैं पर उसके पास उचित समाधान नही हैं. भारतीय किसानो की हालत बहुत ख़राब हैं इस पर लोग केवल बहस करते हैं, राजनीति करते हैं और हाय-तौबा मचाकर भूल जाते हैं. पर इसके लिए कोई कारगर समाधान नही ढूढ़ा जाता हैं. भारती किसान के ख़राब हालत होने के कारण और निवारण

भारत में  किसानो के ख़राब हालत होने के कई कारण हैं जिसके बारे में समाज, राजनेता और हर व्यकित को सोचना चाहिए जो सक्षम हैं उनकी मदत करने के लिए आगे आये यदि समस्या बड़ी हैं तो हमको मिलकर इसके लिए कोई हल निकालना चाहिए.

भारत की राजनीति

भारत की राजनीति इतनी ख़राब हैं कि इसमें अच्छे लोग बहुत कम आते हैं या आते ही नही. इसमें जो लोग गरीबो और किसानो के नाम पर वोट लेकर जीत जाते हैं फिर उन्ही को भूल जाते हैं. किसानो और गरीबो को लगता हैं इस बार कुछ अच्छा होगा. भारतीय राजनीति में सुधार होना चाहिए. कोई ऐसी पार्टी होनी चाहिए जिसमें एक ग़रीब भी चुनाव लड़ सके. यदि कोई नेता या राजनेता चुनाव प्रचार के समय कोई वादा करता हैं तो उसे पूरा करने की लिए कोर्ट आदेश दे क्योकि गलत वादों से चुनाव जीतना अपराध की श्रेणी में आनी चाहिए.

नेता वही वादा करे जो वह 5 बर्ष में पूरा कर सके. नेताओं के कार्यो और उनकी आमदनी की जानकारी किसी वेबसाइट पर होनी चाहिए. इन सबके बाद लोगो को जागरूक होना चाहिए यदि वो वोट देकर नेता बनाते हैं तो उनसे काम लेना भी सीखे.

भारतीय सोच  

भारत के लोगो ने यह मान लिया हैं कि खेती से हम लाभ पा ही नही सकते हैं. यह एक घाटे का काम हैं. इस सोच को बदलने की जरूरत हैं. किसानो को कृषि के बारे में जागरूक करे कि कैसे खेती से लाभ पा सकते हैं. परिवार के सभी सदस्यों को कृषि पर ही निर्भर नही होना चाहिए. आमदनी का कोई और सोर्से होना चाहिए. भारतीय सरकार को ऐसे  लघु उद्योग के बताना चाहिए जो किसान अपने घर से कर सके और खेती भी कर सके. अतिरिक्त आमदनी के लिए उसे शहर में पलायन न करना पड़े.

भारतीय शिक्षा

भारत में ऐसे विषयों के बारे में पढाया जाता हैं जिनका हमारे जीवन में कम या कोई प्रयोग ही नही हैं जबकि कृषि जैसे विषयों को अनिवार्य करना चाहिए. कृषि से सम्बंधित टेक्नोलॉजी के बारे में पढ़ाना चाहिए. कृषि से व्यवसाय को कैसे जोड़ा जाय इस बात को बताना चाहिए. गाँवों में खेती करने के बाद किसानो के पास इतना समय होता हैं जिसका प्रयोग करके अतरिक्त धन कमा सकते हैं. भारत के ज्यादातर किसानो और मजदूरों के अशिक्षित होने के कारण उन्हें उचित प्रकार से शिक्षा और स्वास्थ सम्बन्धी सुबिधाएं नही मिल पाती हैं. सरकारी स्कूलों के आध्यापक को शिक्षा देने में कोई रुचि ही नही होती हैं उन्हें मोटीवेट किया जाय ताकि आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवार के बच्चो को भी अच्छी शिक्षा मिल सके.

उन्हें इतनी शिक्षा मिलनी चाहिए जिससे वे अपने व्यवहारिक जीवन में उसका प्रयोग कर सके और उसके लाभ को समझे और अपने बच्चो को अच्छी शिक्षा दिला सके.

कृषि से संबंधति सरकारी केन्द्रों की निष्क्रियता

भारत में सरकार काफ़ी पैसा कृषि से संबंधति सरकारी केन्द्रों के संचालन में लगाती हैं. इन केन्द्रों के अफ़सर, किसानो की समस्या का कोई समाधान नही देते हैं.  ऐसे अफ़सर उलटे उन किसानो से फर्जी तरीके से धन प्राप्त करने की कोशिश करते हैं. ये सरकारी अफ़सर हम और आप में से ही लोग होते हैं हमें इतना सोचना चाहिए कि कोई किसान हमारी इक गलत निर्णय से आत्महत्या न कर ले. सरकार को जागरूक करने के साथ-साथ हमें खुद को भी जागरूक करना होंगा.

किसानो का लिया हुआ कर्ज

भारत में अधिकत्तर किसान आज भी अशिक्षित हैं जिसके कारण वो अपने आस-पास के साहूकारों से कर्ज उधार लेते हैं जो कि 70% से  120% तक का इंटरेस्ट (सूद) लेते हैं जबकि यही बैंको से लेने पर 12% से 17% तक देना होता हैं. सरकार को इन समस्याओ पर कड़ा क़दम उठाना चाहिए. बैंको के लेन-देन की प्रक्रिया को आसान बनाने की कोशिश करे और किसानो को बैंक सम्बंधित कार्यो की जानकारी देनी चाहिए. बैंको से लोन या कर्ज लेने पर किसानो को बैंक मेनेजर को भी पैसे देने पड़ते हैं.

लघु उद्योग के बारे में

भारत में बहुत से ऐसे लघु  उद्योग हैं जो किसान आसानी से अपने घर से कर सकते हैं. इसके लिए सरकार को जागरूक होना चाहिए. किसानो को लघु उद्योगो के बारे में उचित जानकारी दे ताकि वे अच्छे तरीके से कर सके.

दूसरो से उम्मीद रखना

भारतीय किसान को यह लगता हैं कि यह सरकार नही तो अगली सरकार उनके लिए कुछ अच्छा करेगी. ऐसी सोच का त्याग करे . आपके किस्मत को केवल आप और आपका बेटा बदल सकता हैं. हर समस्या का समाधान होता हैं बस सोच बदलने की जरूरत होती हैं. बच्चो को उचित शिक्षा दिलए. कम-से-कम एक बच्चे को इतना जरूर पढाएँ जो पूरे घर, गाँव और समाज की सोच बदल दे. शिक्षा में बहुत शक्ति होती हैं, यह हर किसान को समझना होगा.

 

वर्तमान सरकार ने भारत की आज़ादी की ७५वें वर्षगांठ (२०२२ ) पर किसानो की आय दुगुनी करने का लक्ष्य रखा है।  जिसे नीति आयोग ने ढांचागत रूप से तैयार किया है।  वर्तमान बिहार  सरकार  राज्य में डीबीटी लाने की तयारी में है जिसमे किसानो द्वारा खपत की गयी बिजली, खाद, बीज आदि पर लगे लागत को सीधे उनके बैंक खाते में ट्रांसफर किया जायेगा और अभीतक मिल रहे सरकारी कृषि अनुदानों जिसका उपयोग किसानो से ज़्यादा गैर-किसान करते आ रहे है , पर विराम लगाया जायेगा।  इस प्रकार कृषि राजस्व में वृद्धि होगी जिसे केवल किसानो , कृषि तकनीकियों व कृषि क्षेत्र में रिसर्च और डेवलपमेंट पर उन पैसों का खर्च किया जायेगा।  खासकर मौजूदा समय में कृषि क्षेत्र में टेक्नोलोजी की उपयोगिता को दरकिनार नहीं किया जा सकता  इसलिए इसके साथ ही कदम से कदम मिलकर बढ़ना होगा.  

आये दिन किसानों की आत्महत्या, सरकार की लचर-पचर नीतियां , बिचौलियापन, प्राकृतिक आपदाओं के कारन आज के युवा खेती-किसानी से दूर होते जा रहे हैं।  अगर यूं कहें की उनका मन खेती-किसानी की और नहीं जाता तो आश्चर्य की बात नहीं. इस खेती-किसानी से भली शहर पलायन कर रोज़ की दिहाड़ी कर जीवन -यापन  करना बेहतर उपाय समझते हैं।  पर हकीकत कुछ और बयान करती हैं वो युवा अपना घर बार छोड़ दो-जून की रोटी की खातिर अपनों से बेगाना होते हैं , शहर के ठेकेदार के चक्कर में पड़ कई बार जमा पूंजी भी गँवा देते हैं, कई गलत व्यसनों के आदि हो  अपना ही नुकसान कर लेते हैं।  ऐसे में सरकार अगर कृषि पर मौलिक बातों को  ध्यान में रख नयी तकनिकी युक्त योजनाएं बनाये और बिना किसी ढील के पारदर्शिता पूर्वक , अच्छी गुणवत्ता वाली मॉनिटरिंग सिस्टम का उपयोग कर नीतियों का क्रियान्वयन करे और तो निश्चित तौर पर कृषि की तरफ लोगों का आकर्षण बढ़ेगा।  भारत की उर्वरायुक्त भूमि में अच्छी उपज कर हम हरेक फसलों का निर्यात विदेशों में बहुतायत मात्रा में कर सकते हैं जिससे किसानों  की आमदनी अच्छी  होगी और कृषि भी अन्य रोज़गार की भांति लोगों द्वारा अपनाया जा सकेगा.

 

organic farming: कृषिजैविक खेती: फ़सलagricare: जैविक कृषि सुरक्षा

चने की खेती के लिए किसान अपनाए रेज्ड-बेज्ड पद्धति

Kisan help - 25 December 2018 - 12:53pm

अल्पवर्षा के कारण किसानों को खेती करने की नई पद्धतियों के साथ खेती करने का मन बनाना होगा। समय रहते किसान भू-जल स्तर, बारिश के पानी प्रदाय की स्थित को ध्यान में रखते हुए रबी की फसल के लिए अहम निर्णय लेना होगा। अल्पवर्षा और सूखे जैसी स्थिति से निपटने किसानों को चने की खेती के लिए रेज्ड-बेज्ड पद्धति से खेती करना होगा। गेहूं की फसल के लिए कम पानी वाली किस्म का चयन करना होगा। 

कम रकबे से मवेशियों के चारे का संकट 

गेहूं का रकबा कम होने से आने वाले दिनों में मवेशियों के लिए चारे का संकट खड़ा होगा।  पशु पालन विभाग को आगामी भविष्य की चिंता से मवेशियों के लिए मक्का पौधे के तने,धान की प्याल,नरवाई नहीं जलाने की सलाह दिया। जल उपभोक्ता समिति के अनुसार किसान पानी की पर्याप्ता को देखते हुए खेती करें। 

किसानों को संगोष्ठी और सम्मेलन में रबी की फसल की खेती करने के लिए प्रेरित किया जाएगा। पानी की स्थिति को देखते हुए फसल को एक-दो पानी वाली किस्म की खेती करें। जितेंद्र सिंह, डिप्टी डायरेक्टर कृषि विभाग 

किसान गेहूं का रकबा कम करें, चना, सरसों,मसूर,मटर,अलसी जैसी फसल की बोवनी करें। इसमें एक या दो पानी देने की जरूरत पड़े। 

एक और दो पानी में बेहतर पैदावार देने वाली किस्म की बोवनी करें। 

चने को रेज्ड-बेज्ड पद्धति से लगाए। इसमें चना खेत में नाली बनाकर सिंचाई की जाती है। 

सरसों की खेती पौधरोपण विधि से करें, इन पौधों की दूरी 2-3 फिट दूर रहे। 

चना और गेहूं के बीच का भंडारण समितियों में किया जाए। ताकि किसानां को परेशानी नहीं हो। 

पूरे देश की आधारशिला है किसान :- डॉ.आर.के.सिंह

Kisan help - 23 December 2018 - 7:41pm

किसान हेल्प ने पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत चौधरी चरण सिंह के जन्म दिवस 23 दिसम्बर को  किसान  दिवस के रुप में मनाया ।  23 दिसम्बर को पूरे देश में किसान दिवस के अवसर पर श्री आर.के .सिंह कहा कि देश की अर्थव्यवस्था में 70% भागीदारी रखने वाला किसान आज़ादी से लेकर आजतक उपेक्षित रहा है किसानों को दुवारा मान सम्मान पाने के लिए एक वार संगठित होना होगा

 श्री आर.के .सिंह की पहल पर पूरे देश में 23 दिसम्बर को किसान दिवस के रूप में मनाया गया  यह पहला अवसर था जिसमें नें माननीय चौधरी चरण सिंह जी के जन्म दिवस को राष्ट्रव्यापी रूप से मनाया  देश के  उत्तर प्रदेश ,राजस्थान ,उत्तराखंड ,गुजरात,महाराष्ट्र पूना ,मध्य प्रदेश ,पंजाब आदि राज्यों के  कई जिलों  में किसान दिवस मनाया जिसमें हजारों किसानों ने भाग लिया बरेलीउत्तर प्रदेश में किसान दिवस का संचालन स्वम् राधा कान्त जी नें किया जिसमे बिभिन्न जिलों एवं राज्यों के हज़ारों लोगो ने भाग लिया 

अपने भाषण में उन्होंने कहा कि पूरे देश की आधारशिला है । किसान देश के प्रधानमंत्री रहने के बाद भी श्री चौधरी अपने देश के गरीब किसानो को नही भूले उन्होंने किसानो के हित बहुत कार्य किये जिन्हें भुलाया नही जा सकता है इसीलिए उन्हें किसानो का मसीहा कहा जाता है 

साथ ही उन्होंने सभी राज्य सरकारों एवं केन्द्र सरकार से विनती की कि श्री चौधरी के सपनो को पूरा करे किसानों को उनका अधिकार दें ताकि किसान अपना अनाज एवं एनी उत्पादन अपनी लागत के अनुपात में बेंच सके । 

श्री आर.के .सिंह  ने कहा कि  "भारत के अधिकाश क्षेत्रफल पर खेती की जाती है। एवम प्रमुख आय का साधन है। आजादी के बाद हर क्षेत्र में काफी सुधार हुए है। लेकिन किसानो की स्थिति में कोई विशेष सुधार नही हुए है। यदि हम आंकड़े देखे तो किसानो की आत्महत्या दर में लगातार बढ़ोतरी हुई है। कहने को तो किसान अन्नदाता और जिमीदार है। लेकिन दिनरात मेहनत कर के भी मजबूर और असहाय है। क्यों की कृषि पृक्रति पर आधारित है। और प्रकति किसी के वश में नही हे अतः कड़ी मेहनत करने के बाद भी किसान लाचार हो जाता है। लेकिन हिम्मत कभी नही छोड़ता है। वो देश के सच्चे सिपाई की तरह फिर से अपने कर्म में लग जाता है। क्यों की कहा गया हे जय जवान -जय किसान। 

किसान देश की नीव है और जब नीव पर संकट आता है तो पूरा देश की आधारशिला हिल जाती हे सारी अर्थव्यवस्ता गड़बड़ा जाती है। 

इसलिए आज सरकार को कृषि और किसानो के लिए ऐसी योजनाए बनानी चाहिए जिस से किसान आत्महत्या जैसा कृत्य ना करे और खेती छोड़कर ना जाए। जिस तरीके से सरकारी कर्मचारियों, नोकरी ,व्यापर में  लगातार जीवन स्थर को उठाया जा रहा है वेसे ही किसान के जीवन स्थर को उठाने में कठोर कदम उठाना चाहिए।

Tags: किसानकिसान दिवस23 दिसम्बर

कृषि उत्पादन में कीटनाशकों की भूमिका

Kisan help - 12 December 2018 - 11:36pm

कीटनाशक रासायनिक या जैविक पदार्थों का ऐसा मिश्रण होता है जो कीड़े मकोड़ों से होनेवाले दुष्प्रभावों को कम करने, उन्हें मारने या उनसे बचाने के लिए किया जाता है। इसका प्रयोग कृषि के क्षेत्र में पेड़ पौधों को बचाने के लिए बहुतायत से किया जाता है। कीटनाशकों को उनके उपयोग और अमल के तरीकों के अनुसार वर्गीकृत किया जा सकता है जैसे कीटनाशक, कवकनाशी, शाकनाशी इत्यादि |
उर्वरक पौध की वृद्धि में मदद करते हैं जबकि कीटनाशक कीटों से रक्षा के उपाय के रूप में कार्य करते हैं। कीटनाशक कीट की क्षति को रोकने, नष्टर करने, दूर भगाने अथवा कम करने वाला पदार्थ अथवा पदार्थों का मिश्रण होता है। कीटनाशक रसायनिक पदार्थ (फासफैमीडोन, लिंडेन, फ्लोरोपाइरीफोस, हेप्टासक्लोथर तथा मैलेथियान आदि) अथवा वाइरस, बैक्टी्रिया, कीट भगाने वाले खर-पतवार तथा कीट खाने वाले कीटों, मछली, पछी तथा स्तेनधारी जैसे जीव होते हैं।
बहुत से कीटनाशक मानव के लिए जहरीले होते हैं। सरकार ने कुछ कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगा दिया है जबकि अन्यल के इस्तेंमाल को विनियमित (रेगुलेट) किया गया है।
भारतीय कृषि क्षेत्र में 1950 के दशक में कीटनाशकों का इस्तेमाल नगण्य था जिसमें प्रथम पंचवर्षीय योजना के शुरुआत में कीटनाशकों का केवल 100 टन का उपयोग किया गया | 2010-11 में कीटनाशकों(प्रौद्योगिक स्तर की सामग्री ) की खपत 55.54 हज़ार टन रही | हालांकि, यहाँ कीटनाशकों की खपत के स्तर में व्यापक अंतर-राज्य मतभेद हैं।

कीटनाशकों के  प्रभाव
हाल के दिनों (विशेष रूप से पिछले दो दशकों के दौरान) में, कीटनाशकों के बेरोकटोक उपयोग के कारण स्वास्थ्य पर खतरे तथा पर्यावरणीय समस्याओं की तरफ ध्यान गया है |  स्वास्थ्य को दोनों प्रकार से खतरा है प्रत्यक्ष व् अप्रत्यक्ष | 
कीटनाशकों के उपयोग के साथ एक और समस्या यह है कि लक्षित कीट उनके प्रति प्रतिरोधक  क्षमता विकसित कर रहे हैं । नतीजतन, अधिक से अधिक जहरीले रसायनों की खुराक का प्रयोग ज्यादा से ज्यादा किया जा रहा है | उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग के कारण पौधों में कई शारीरिक परिवर्तन हो रहे हैं जिससे कई कीटों का गुणन और प्रसार हो रहा है | उपरोक्त कारणों को देखते हुए अब ना सिर्फ कीट उन्मूलन की आवश्यकता है परन्तु इसके अलावा कम से कम  पारिस्थितिक नुकसान के साथ कीटनाशी रसायनों का किफायती उपयोग भी शामिल है |

वर्तमान में पौध संरक्षण प्रणाली में उपयोग होने वाले तीन प्रमुख पहलु निम्न हैं - एकीकृत कीट प्रबंधन के माध्यम से कीट और रोग नियंत्रण (आईपीएम) योजनाएँ , टिड्डों की  निगरानी और नियंत्रण, और पौधे और बीज संगरोध | एकीकृत कीट प्रबंधन में  कीट निगरानी, कीटों के जैविक नियंत्रण को प्रोत्साहन, प्रदर्शन का आयोजन, आईपीएम प्रौद्योगिकी के बारे में प्रशिक्षण व जागरूकता को बढ़ावा देना शामिल है | आईपीएम प्रौद्योगिकी सुरक्षित कीटनाशकों के उपयोग को प्रोत्साहित करती है जिसमें वान्स्पतिक (नीम आधारित ) तथा जैव-कीटनाशक भी शामिल हैं |

भारत में इस्तेमाल होने वाले आम कीटनाशक क्या हैं?
भारत में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशकों को रासायनिक प्रकृति के आधार पर पांच प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

1. ऑरगेनोक्लोराइड्स(Organochlorides): - ये अणु प्रति क्लोरीन की कई परमाणुओं के साथ मिलकर बने कार्बनिक यौगिक हैं। डीडीटी, BHC, एल्ड्रिन, डीएल्ड्रिन और एनड्रीन ये सब क्लोरीन कीटनाशक हैं । डीडीटी सबसे पुराना और सबसे लोकप्रिय कृत्रिम कीटनाशक है। BHC अकेले कुल कीटनाशक की मात्रा के 50% कीटनाशक है | एल्ड्रिन का प्रयोग  इमारतों की नींव/ तल में दीमक के हमलों को रोकने के लिए किया जाता है | ये सभी रसायन लिपोफिलिक (lipophillc) हैं और ये जानवरों की वसा ऊतकों में जाकर जैवसंचित हो जाते हैं |

2. ओर्गेनोफोस्फेट्स (Organophosphates): - मैलाथियॉन का प्रयोग मलेरिया रोधी योजनाओं में किया जाता है और पैराथियॉन (Parathion) फोस्फोरिक एसिड के साथ मिलकर बना कार्बनिक यौगिकों के यौगिक हैं | फेनिट्रेत्थियॉन( Fenitrethion),  मैलाथियॉन और पैराथियॉन तंत्रिका तंत्र पर बहुत प्रभावकारी होते हैं |

3. कार्बामेट (Carbamates): - ये एसिटीकॉलिन (acetylcholine) के समान एक रासायनिक संरचना वाले यौगिक हैं। कार्बोफ्युरेन (furadon), प्रोपोक्स़र (baygon) कार्बामेट कीटनाशक हैं ।

4.प्य्रेथ्रोईडस (Pyrethroids): - ये प्य्रेथिन (pyrethin,) से निकले संश्लेषिक उत्पाद हैं, गुलदाउदी सिनेरारिफोलियम से निकला गया एक संयंत्र रासायनिक |

5. त्रियाज़ींस (Triazines): - ये यूरिया से उत्पन्न हुए सिमाजीन (simazine),अल्ट्राजीन (altrazine) जैसे यौगिक हैं। ये प्रभावशाली शाकनाशी (herbicides) हैं जिन्हें  चाय, तंबाकू और कपास की निराई के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता है |

कीटनाशकों के हानिकारक प्रभाव:-
आज हमारे देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों के खेती में कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग हो रहा है। हमारे खाने में मीठा जहर परोसा जा रहा है, जो सिंचाई जल और कीटनाशकों के जरिए अनाज, सब्जियों और फलों में शामिल हो रहा है। कीटनाशक के ज्यादा इस्तेमाल से भूमि की उर्वरा शक्ति कम हो रही है तथा यह कीटनाशक जमीन में रिसकर भूजल को जहरीला बना रहा है। नदियों तालाबों तथा अन्य जलस्रोतों में बहकर वहां के पानी को जहरीला बनाता है जिससे इंसानों के साथ-साथ पशु-पक्षियों और पर्यावरण को खासा नुकसान पहुंच रहा है I

जैविक कीटनाशकों से लाभ:-
•  जीवों एवं वनस्पतियों पर आधारित उत्पाद होने के कारण, जैविक कीटनाशक लगभग एक माह में भूमि में मिलकर अपघटित हो जाते है तथा इनका कोई भी अंश अवशेष नही रहता | यही कारण है इन्हें परिस्तिथतकीय मित्र के रूप में जाना जाता है | 
•  जैविक कीटनाशक केवल लक्षित कीटों एवं बीमारियों को मारते है जब कि कीटनाशक से मित्र कीट भी नष्ट हो जाते है |
•  जैविक कीटनाशकों के प्रयोग के तुरंत बाद फलियों, फलों, सब्जियों की कटाई कर प्रयोग में लाया जा सकता है जबकि रासायिनक कीटनाशकों के अवशिष्ट प्रभाव को कम करने के लिए कुछ दिनों की प्रतीक्षा करनी पड़ती है | 
•  जैविक कीटनाशकों के सुरक्षित, हानिरहित तथा परिस्तिथतकीय मित्र होने के कारण विश्व में इनके प्रयोग से उत्पादित चाय, कपास, फल, सब्जियां, तम्बाकू तथा खाद्यानों, दलहन एवं तिलहन की मांग एवं मूल्यों में वृद्धि हो रही है, जिसका परिणाम यह है कि कृषकों को उनके उत्पादों का अच्छी कीमत मिल रही है | 
•  जैविक कीटनाशकों के विषहीन एवं हानिरहित होने के कारण ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में इनके प्रयोग से आत्महत्या की सम्भावना शून्य हो गयी है जबकि कीटनाशी रसायनों से अनेक आत्म हत्यांए हो रही है | 
•  जैविक कीटनाशक पर्यावरण, मनुष्य एवं पशुओं के लिए सुरक्षित तथा हानिरहित है | इनके प्रयोग से जैविक खेती को बढ़ावा मिलता है जो पर्यावरण एवं परिस्तिथतकीय का संतुलन बनाये रखने में सहायक है | 
हरित क्रान्ति की सफलता के बाद भारत में कीटनाशकों के उपयोग में काफी वृद्धि हुई है |हालांकि कीटनाशकों के उपयोग से भारतीय फसलों की रक्षा ज़रूर हुई है, परन्तु साथ ही साथ यह पर्यावरण क्षरण तथा  इंसान और जानवरों के लिए खतरे का कारण बन गया है।

अखरोट की खेती

Kisan help - 26 November 2018 - 10:08am

अखरोट (जुगलांस प्रजातियाँ) देश का अति महत्वपूर्ण शीतोष्ण फल है। अखरोट उत्तराखण्ड का एक महत्वपूर्ण फल है जो कि केवल मुख्यतः पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाता हैं। अखरोट में मौजूद ओमेगा-3 व 6 फैटी अम्ल एवं 60 प्रतिशत तेल की मात्रा होने की वजह से यह पोष्टिक, औषधीय एवं औद्योगिक रूप से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह रक्त में कोलेस्ट्रोल का स्तर कम करने के साथ-साथ रक्त वाहनियों की क्रियाओं के सुचारू संचालन तथा मैमोरी बढ़ाने में भी सहायक होता है।भारत में अखरोट अलग-अलग आकारों एवं आकृतियों के पाए जाते हैं। भारतीय अखरोटों की चार श्रेणियाँ अर्थात कागज़ी खोलदार, पतला-खोलदार, मध्यम खोलदार, सख्त खोलदार अखरोट है। अखरोट 900 से 3000 तक की ऊंचाई पर फलता है | 

खेती के क्षेत्र :
जम्मू और कश्मीर, उत्तरांचल, हिमाचल प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश प्रमुख उपजाऊ क्षेत्र है लेकिन कुल क्षेत्र एवं उत्पादन में जम्मू और कश्मीर में सर्वाधिक क्षेत्र में अखरोट की खेती की जाती है।

 

भारत के विभिन्न राज्यों में उगाए जाने वाले अखरोटों की किस्में हैं :

 

 

जम्मू और कश्मीर लेक    इंग्लिश, ड्रेनोवस्की और ओपक्स कॉलचरी  

हिमाचल प्रदेश              गोबिन्द, यूरेका, प्लेसेन्टिया, विल्सन फ्रैंकुयेफे और कश्मीर अंकुरित   

उत्तरान्चल                   चकराता सिलेक्शन्स

 

अखरोट का पेड़ 

 

अखरोट के उत्पत्ति का स्थान हमे  ईरान  मिलता है जहा से शुरू होकर ये  इटली  स्पेन, फ्रान्स, जर्मनी होते हुए  भारत में इसकी   खेती सेब या एप्पल  की खेती की  तरह ही  हिमाचल प्रदेश ,उत्तराखंड , कश्मीर के कुपवाड़ा, उड़ी, , द्रास और पुंछ आदि बर्फीली घाटियों और अरूणाचल प्रदेश  जैसे राज्यों में की जाती है 

 

अखरोट का तेल

 

जो त्वचा , बालों और दिल के लिए लाभकारी होता है। मानव शरीर के लिए अखरोट का तेल सबसे लाभकारी होता है। 

इसके फलों का छिलका पतला होता है। जिसे ही  'कागजी अखरोट' कहते हैं#2404; इसका उपयोग बन्दूकों के कुन्दे बनाये में किया जाता हैं

 

अखरोट  का पोधा 

 समुद्र तल से  करीब 1200 से 2200 मीटर की उंचाई पर लगने वाले

अखरोट   का फल बहार से एक हरे आवरण में लिपटा हुवा किसी गोल आकार की कैरी की तरह  नजर आता है

अखरोट को फलने फूलने के लिए मौसम का तापमान 10 डिग्री सेंटीग्रेट से नीचे होना चाहिए।  इसका फल जैसे ही इसका   तापमान 2 से 4 सेंटीग्रेट  तक बढ़ता है, वैसे ही फल की ऊपरी परत सूखने लगती है और ये  फल तैयार  हो जाता है

 

 जैसे ही अखरोट के पोधे को ग्राफ्टिंग से   तेयार होने  के बाद हम सभी जानते है की  शीतोष्ण कटिबंधी  पोधो की रोपाई का काम ठण्ड के मोसम में  यानि की जनवरी में की जाती है  अखरोट की खेती के लिए 1 मीटर लम्बा, 1 मीटर  चोडा,और 1 मीटर गहरा  गड्डे खोद कर उसमे  अखरोट के पोधे को लगाते है

 

 खाद  और उर्वरक 

 

गड्डे खोदने के बाद निकाली  गई  बहार की मिट्टी  में हम  नत्रजन ,फास्फोट,पोटाश और गोबर की खाद मिला दी जाती है  जिसमे हमे नत्रजन  की 50 से 60  gm ,

फास्फोट की 40 से 45 gm,और पोटाश की  35 से 40 gm  मात्रा  को 10 gm गोबर की खाद में अच्छी तरह  मिला कर

 

 मिट्टी में इन तीनो  पोषक तत्वों को पोधे के  बढवार के समय देना आवश्यक है जब तक की ये फल देने लायक ना हो जाये

ध्यान रहे जिस भी भूमि में अखरोट लगाने  से पहले वहा पर मिट्टी की जाच कर पोषक तत्व देना एक वैज्ञानिक तरीका है 

 

 पर्वतीय क्षेत्र में अखरोट बहुतायत में होता है। अन्य फल  की तुलना में ये एक लंबे समय तक (करीब 200 साल )इसकी खेती फायदा पहुचाती है वर्तमान में अखरोट की वैज्ञानिक पद्धति से खेती कर अच्छी पैदावार लेने का अब हमारे पास पहले से आधिक अच्छा  सुनहर मोका है।

भारत तथ्य और आंकड़े :
वर्ष 2016-17 के दौरान देश ने 2,191.19 मीट्रिक टन अखरोट का निर्यात विश्वभर में किया गया और 55.27 करोड़ रुपए / 8.27 मिलियन अमरीकी डॉलर अर्जित किए।

प्रमुख निर्यात लक्ष्य (2016-17): भारत से अखरोट के आयातक देशों में फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम, नीदरलैंड, संयुक्त अरब गणराज्य, नेपाल, जर्मनी और सूडान प्रमुख है।

 

 

organic farming: अखरोटजैविक खेती: औषधिबागवानीमसाले

अन्नदाता मजदूर बनने को विवश

Kisan help - 17 November 2018 - 12:45am

विख्यात कथाकार मुंशी प्रेमचंद की प्रसिध्द कहानी ‘पूस की एक रात’ का ‘हल्कू’ आज की इस निर्मम और संवेदनही व्यवस्था का एक सच है। देश का अन्नदाता भूखा है। उसके बच्चे भूखे हैं. भूख और आजीविका को अनिश्चिता से खेती-किसानी छोड़कर मजदूर या खेतिहर मजदूर बनने को विवश कर रही है। कहा जाता है कि जब खेती का आविष्कार हुआ, तो वह मनुष्यों का नहीं, शिकार के दौरान पकड़े गए पशुओं का पेट भरने के लिए सबसे पहले खेती की गई थी। पहले तो मानव अपने शिकार को पकडऩे के बाद तुरंत मार दिया करता था। तत्काल वध करने से जब तक मांस उपयोग करने लायक रहता उसका उपयोग करते थे, लेकिन बहुत सारा मांस सड़कर खराब हो जाता था। कालांतर में मनुष्यों की समझ में आया कि यदि इन पशुओं को एक-एक कर अपनी आवश्यकता के हिसाब से वध किया जाए, तो ज्यादा उचित होगा। माना जाता है कि तभी पशुपालन और उसके बाद चरागाहों के घटने पर खेती का आविष्कार हुआ। बाद में खेती द्वारा उपजाए गए खाद्यान्न का उपयोग मानव समाज खुद के जिंदा रहने के लिए करने लगा। कालांतर में एक ऐसा भी समय आया, जब सामाजिक चेतना के चलते मांसाहार कम होता गया और मानव समाज शाकाहारी होता चला गया। लोगों के एक समुदाय ने खेती करके खाद्यान्न उत्पादन को पेशे के रूप में अपना लिया जिन्हें किसान कहा जाने लगा। भारत में तो सत्तर से अस्सी फीसदी लोग प्राचीनकाल से ही खेती पर ही निर्भर रहे हैं। खेती के चलते गांव बसे और उन गांवों में कुछ लोगों ने खेती में सहायक होने वाले उद्योग-धंधे अपना लिए और मिल-जुलकर समाज के विकास में अपनी भूमिका का निर्वाह करने लगे। जब भी देश और समाज में खाद्यान्नों का संकट आया, तो उन्हें अपनी क्षमता से अधिक अन्न उपजाकर अपने को अन्नदाता का रुतबा हासिल किया। समाज में तो खेती और किसानों को इतना सम्मान हासिल था कि इस पेशे को ही उत्तम बताया गया। जब देश पर संकट आया, तो किसानों ने अपने हल को पिघलाकर तलवार बना ली और शत्रुओं का वध करने के लिए रणभूमि में उतर पड़े। युद्धकाल में सैनिक और शांतिकाल में किसान की दोहरी भूमिका निभाने वाले किसानों की दशा आज बहुत खराब है। आजादी के बाद से ही किसानों की दशा सुधारने की दिशा में बहुत कम प्रयास किए गए। जितनी भी देश में सरकारें बनीं, सबका ध्यान औद्योगिक विकास पर ही रहा। उन्होंने कल-कारखानों के विकास की दिशा में तो पुरजोर प्रयास किया, लेकिन इस देश के अन्नदाता किसानों को भगवान के भरोसे छोड़ दिया गया। जब सन 1965 का युद्ध हुआ और देश में खाद्यान्न की बहुत अधिक कमी हो गई, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री ने 'जय जवान, जय किसानÓ का नारा दिया, तो खाली पेट सोने वाले किसानों ने एक बार फिर अपनी क्षमता से अधिक उत्पादन करके देश का मान-सम्मान बचाए रखा। लेकिन अफसोस है कि कभी किसान, तो कभी सैनिक के रूप में वेशधारण करने वाला किसान आज खुद भूखा है, कर्जदार है, हैरान-परेशान है। उसकी पीड़ा और संकट को लेकर कोई भी गंभीर नहीं है, न केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकारें। सब दूर से ही हो-हल्ला करके किसानों को बरगलाने में जुटी हुई हैं। यह किसानों का ही परिश्रम और सेवा भावना थी कि भारतमाता को ग्रामवासिनी का दर्जा मिला हुआ है। अब तो किसानों को अन्नदाता और भारतमाता को ग्रामवासिनी कहना, किसानों और देश का अपमान करने जैसा लगता है। यदि हमारे राजनेता ऐसा समझते-मानते तो किसानों की यह दशा तो कतई नहीं हुई होती। अब जब भी नेता किसानो की प्रशंसा में कसीदे काढ़ते हैं, तो साफ लगता है कि ऐसा कहने के पीछे राजनीति चमकाने की भावना है या फिर इस देश के करोड़ों किसानों का वोट हथियाने की लालसा है। भारतमाता के ग्रामवासिनी होने के साक्ष्य सरकारी या गैर सरकारी आंकड़े नहीं देते हैं। यह भी सही है कि इस देश की आधी से ज्यादा आबादी गांवों में रहती है और उसकी जीविका का साधन खेतीबाड़ी या फिर खेती से जुड़े सहायक धंधे हैं। आज जब देश में खेतीबाड़ी ही जर्जर हालत को प्राप्त हो रही है, तो फिर इन सहायक धंधों का क्या हाल होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। ताज्जुब की बात है कि इतनी बड़ी आबादी का देश के कुल जीडीपी में योगदान पिछले कई दशकों से सिकुड़ता जा रहा है और अब 15 प्रतिशत से भी कम रह गया है। यह सेवा-क्षेत्र के महाविस्तार का समय है। वर्ष 2014-15 में भारतीय सेवा-क्षेत्र का मूल्य 61.18 लाख करोड़ रुपये आंका गया था, औद्योगिक क्षेत्र का मूल्य 34.67 लाख करोड़ रुपये, तो खेतीबाड़ी व सहायक गतिविधियों का मोल महज 19.65 लाख करोड़ रह गया है। इसलिए, आज जब कोई 'बढ़ते और विकास करतेÓ भारत की बात कहता है, तो उस ग्रामवासिनी भारतमाता की बात नहीं कहता, जिसका आंचल खेतों के रूप में पसरा है, बल्कि खेत-खलिहान के भारतीय महासमुद्र के भीतर सेवा-क्षेत्र के रूप में लगातार बढ़ते समृद्धि के उन टापुओं की बात करता है, जिसकी आर्थिक ताकत खेतीबाड़ी की तुलना में चार गुना ज्यादा बढ़ गई है। खेतीबाड़ी के विकास का आलम यह है कि देश में 1990 में कुल फसली इलाके का 34 प्रतिशत हिस्सा सिंचित था, तो बीस बरस बाद भी सिंचित इलाके में इतना विस्तार ना हो सका कि वह कुल फसली क्षेत्र का 50 प्रतिशत हिस्सा भी पार कर सके। देश की आधी आबादी के जीवन-जीविका का आधार कहलाने वाली खेतीबाड़ी का आधा से ज्यादा हिस्सा अब भी मॉनसून के मिजाज पर ही निर्भर है। देश में कर्जदार किसान परिवारों की संख्या बीते दस सालों (2003-2013) में 48.6 प्रतिशत से बढ़ कर 52 प्रतिशत हो गई है और हर कर्जदार किसान परिवार पर औसतन 47 हजार रुपये का कर्ज है। एक ऐसे समय में, जबकि किसान-आत्महत्या के ज्यादातर मामले कर्जदारी और गरीबी से संबंधित हैं, केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली का कृषि-क्षेत्र पर विशेष ध्यान देने, खेती में निवेश बढ़ाने और खेतीबाड़ी को घेरनेवाली चुनौतियों से निबटने की बात कहना निश्चित रूप से प्रशंसनीय है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अगले बजट में खेती पर कुछ वैसे ही ध्यान दिया जाएगा, जैसा कुछ शुरुआती पंचवर्षीय योजनाओं में दिया गया था। वैसे पिछले साल वित्त मंत्री ने बजट से पूर्व लंबी-चौड़ी बातें किसानों के पक्ष में की थी, लेकिन बाद में पिटारे से किसानों के लिए कुछ नहीं निकला था। जो निकला था, वह किसानों के लिए बहुत कम था।

बादाम की खेती

Kisan help - 4 November 2018 - 2:04pm

बादाम हालांकि एक मेवा होता है, किन्तु तकनीकी दृष्टि से यह बादाम के पेड़ के फल का बीज होता है। बादाम का पेड़ एक मध्यम आकार का पेड़ होता है और जिसमें गुलाबी और सफेद रंग के सुगंधित फूल लगते हैं। ये पेड़ पर्वतीय क्षेत्रों में अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। इसके तने मोटे होते हैं। इसके पत्ते लम्बे, चौड़े और मुलायम होते हैं। इसके फल के अन्दर की मिंगी को बादाम कहते हैं। बादाम के पेड़ एशिया में ईरान, ईराक, मक्का, मदीना, मस्कट, शीराज आदि स्थानों में अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। इसके फल वानस्पतिक रूप से अष्ठिफल के रूप में जाने जाते हैं और उनमें एक बाह्य छिलका होता है तथा एक कठोर छाल के साथ अंदर एक बीज होता है। आमतौर पर बादाम बिना छिलके के ही मिलता है। इसका बीज निकालने के लिए छिलके को अलग करना होता हैबादाम एक गुलाब वर्गीय एक ऐसा पेड़  है जिसका फल   दिखने में आडू की तरह का होता है   बादाम के पेड़ में हल्के  गुलाबी और सफेद रंग के सुगंधित फूल लगते हैं। बादाम के पेड़  का  तना मोटा होते हैं। एवंम इसके पत्ते लम्बे, चौड़े और मुलायम होते हैं।

 

बादाम की खेती कहाँ होती है

बादाम की खेती प्राय: ठन्डे क्षेत्रो में की जाती है जिसे बीज के द्वारा भी लगाया जा सकता है  दुनियाभर में अमेरिका बादाम का सबसे बड़ा निर्यातक देश है जहा का कैलोफोर्निया बादाम दुनियाभर  में खाया जाता है जो की आकार में भारतीय बादाम से बड़ा होता है
इसके अलावा बादाम की खेती स्पेन, इटली, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, मोरक्को, पुर्तगाल, तुर्की, फ्रांस, अल्जीरिया, अफगानिस्तान और पर्सिया जैसे देशों में भी  बादाम की खेती की जा सकती है

भारत में बादाम की  खेती   की बात  जाये तो ये कश्मीर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड  जैसे ठन्डे क्षेत्रो  और चीन की सीमा से लगे  तिब्बत, लाहौल एवं किन्नोर जिले आदि में की जाती है

बादाम के प्रकार

बाजार में कई प्रकार की बादाम मिलतीहै जिसमे मामरा , केलिफोर्निया या अमरीकन बादाम तथा छोटी गिरी मुख्य हैं। मीठी बादाम  ही खाने में काम आती है। कड़वी बादाम का तेल निकाला जाता है

मामरा बादाम

मामरा बादाम और केलिफोर्निया बादाम में क्या फर्क होता है

 मामरा बादाम और  केलिफोर्निया बादाम में अंतर की बात करे तो जहा मामरा अफगानिस्तान में पैदा होता है एवंम  इसका उत्पादन अपेक्षाकृत कम होता है। वही अमरीकन बादाम केलिफोर्निया में पैदा होता है और इसका उत्पादन अत्यधिक मात्रा में होता है। इसका कारण वैज्ञानिक तरीके से खेती करना है।

बादाम की उन्नत किस्में

केलिफोर्निया पेपर सेल, नान पेरिल, ड्रेक, थिनरोल्ड, आई.एक्स.एल., नीप्लस अल्ट्रा,  मुख्य रूप से बादाम की किस्मे है

आप भी बादाम के प्लांट आसानी से उगा सकते हो | जुलाई के समय बादाम के प्लांट को आपने बगीचे में लगा सकते है
 

 

बादाम खेती के लिए आवश्यक जलवायु

बादाम की खेतीं के लिए  जलवायु की बात की जाये तो इसके लिए , गर्मियों में तापमान में 30 से 35 डिग्री सेल्सियस पौधे की वृद्धि और गिरी भरने के लिए  आवश्यक है एवमं  सर्दियों में 2.2 डिग्री सेल्सियस तक का सामना करना पड़ेगा, लेकिन पत्ती के गिरने के अवस्था में फूल 0.50 डिग्री सेल्सियस से -11 डिग्री सेल्सियस में क्षतिग्रस्त हो सकते हैं। फूल जब  छोटे होते है तब वे  2.2 डिग्री सेल्सियस से 3.3 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान का सामना कर सकते हैं, लेकिन अगर कम तापमान निरंतर लंबे समय तक बने रहने पर ये फसल को आसानी से  नुकसान पंहुचा सकता हैं

बादाम कैसे उगायें ?

आप अपने बगीचें में बादाम का पौधा दो तरीके से उगा सकते है।

▪ स्वयं बादाम का बीज उगाकर
▪नर्सरी से बादाम का पौधा खरीद कर।

बादाम खाना जितना आसान है उतना ही कठिन इसे उगाना है।बादाम ठण्ठे मौसम में उगाया जाता है।अगर आप गर्म क्षैत्र में रहते है तो फिर आप  इसे केवल सर्दियों में ही उगा सकेगें।11 से 20 डिग्री मौसम इसके लिये सर्वोत्तम है।बादाम उगाने में कुछ सावधानियां रखनी होती है।

बीज से बादाम उगाने का तरीका।

▪बीज से बादाम उगाने के लिए बहुत धैर्य की जरूरत होती है । हमारे पास बादाम के उच्च क्वालिटी के स्वस्थ बीज होने चाहिए ।ध्यान रखें बादाम का अंकुरण प्रतिशत  कम होता है ।तो आप कम से कम 15 से 20 बीज एक बार में उगाने की कोशिश करें।

▪ बादाम के स्वस्थ बीजोंको  हम टिशू पेपर में रख कर पानी से भिगो दिया जाता है। इस टिश्यू पेपर में रखे बीजों को आप किसी ऐसी जगह रखें जहां लगातार 15 से 20 डिग्री का तापमान बना रहे। सर्दियों के समय आप इसे किसी भी जगह रख सकते हैं । मौसम गर्म होने पर फ्रिज की सहायता से यह काम किया जा सकता है। 20 दिन बाद बादाम के बीजों में अंकुरण शुरू होता है ।एक बार अंकुरण शुरू हो जाने पर आप बादाम के बीजों को सावधानी से टिशू पेपर से अलग करें । उसके बाद बादाम के अंकुरित बीजों को कोकोपीट में लगा दें । धीरे -धीरे 40 दिन बाद बादाम का अंकुरण छोटे पौधे का रूप ले लेता है। आपको इस समय बादाम को ज्यादा पानी नही देना  और  गर्मी से बचाकर रखना है

बादाम को हम रोपण करने से पहले,  लगभग 3 फुट  लम्बाई x 3 फीट  चोडा x 3 फीट गहरा  गड्ढे में  सितंबर से अक्टूबर के महीने के दौरान पक्तियों में  पौधे की पौधे से दुरी करीब 5 मीटर रखकर लगाना चाहिए  बादाम के पौधों को फरवरी से मार्च तक गड्ढे के केंद्र में लगाया जाना चाहिए,

बादाम 3 से 4 साल में फल देना शुरू कर देता है जो की पूरी तरह से फल देने लायक 6 साल में हो जाता है एक बादाम के पेड़ से इस तरह 50 साल तक बादाम के पेड़  से  फल प्राप्त  किये जा सकते है।

इस प्रकार बादाम को पौधा तैयार हो जाता है।तीन महीने बाद आप इन पौधों को जमीन में लगा सकते है।

बादाम खाने के नुकसान और फायदे :-
बादाम भारतीयों की  सबसे पसंदीदा गिरी है और खास मेवा है । यह सभी गिरियों में ज्यादा पोषक एवं औषधीय गुणयुक्त है। इसकी गिरी से महत्तवपूर्ण तेल बादाम रोगन प्राप्त होता है। जब गिरी पक जाती है तब तुड़ाई की जाती है। बादाम गिरी ऊर्जा का बहुत अच्छा स्रोत है। 100 ग्राम ताजी गिरी में 598 कैलोरी ऊर्जा, 19 ग्राम प्रोटीन, 59 ग्राम वसा तथा 21 ग्राम कार्बोहाइड्रेट होता है  गुणों से भरपूर बादाम का बहुत आधिक मात्रा में सेवन करना हमारे शरीर के लिए नुकसान दायक होता है

 

organic farming: बादामजैविक खेती: औषधिबागवानीमसाले